हमें एकांतवास में छोड़ गए इरफान भाई
इरफान भाई आप तो चले गए और हमें एकांतवास में छोड़ गए। अभी क्या उम्र थी, जो आप हम सबको रुलाकर एकांतवास में छोड़ चले। आपका वह चेहरा आज भी आंखों के सामने घूम रहा है, जब आप हम सबके साथ कंपनी बाग़ पब्लिक लाइब्रेरी के सामने क्त्रिस्केट खेलते थे। मेरी स्कूटर लेकर इलाहाबाद का कोना कोना घूमते थे।
इरफ़ान भाई याद है आपको पहले दिन शूटिंग के समय जब आप विजयनगरम हॉल मे हुएं शॉट के लिए तैयार हो रहे थे, उस समय ड्रेसिंग रूम में हम सब कितने सहज तरीके से एक दूसरे से बात कर रहे थे। तिग्मांशु तो अपने लेखन एवं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की नेतागिरी से परेशान होकर सबसे दूर रहकर एकाग्रता से काम करता रहा, लेकिन इरफान भाई मस्त मौला। तब तक उनकी कोई ख़ास पहचान नहीं बनी थी। इसलिए हम लोगों के साथ कहीं भी घूमने निकल जाते थे।