कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ज्ञान सिंह बनाम पंजाब सहित कई अन्य मामलों का हवाला दिया। कहा कि शीर्ष न्यायालय ने इन आदेशों में स्पष्ट किया है कि अगर विवाद गंभीर प्रकृति के नहीं है और उसमें सजा की संभावना कम हो तो समय को निरर्थक कार्यवाही में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।
अगर, अपराध गंभीर प्रकृति का है। जैस-हत्या, लूट, डकैती, दुष्कर्म आदि मामलों में पक्षकारों के बीच भले ही समझौता हुआ हो उसमें राहत नहीं दी जा सकती है। लेकिन अगर मामला वाणिज्यिक, वित्तीय, व्यापारिक या इस तरह के लेनदेन से उत्पन्न अपराध या दहेज से संबंधित, विवाह से उत्पन्न होने वाले अपराध, पारिवारिक विवाद जहां गलती मूल रूप से निजी या व्यक्तिगत प्रकृति की है और पक्षकारों ने अपने पूरे विवाद को सुलझा लिया है तो उसमें दोष सिद्ध किए जाने की संभावना बहुत कम है।