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इंटरनेट की चिड़िया हुई फुर्र और ‘हैंग’ हो गया प्रयागराज

Sun, 22 Dec 2019 12:50 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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yash malviya - फोटो : प्रयागराज
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यश मालवीय
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इंटरनेट के बिना तकरीबन दो दिन बीत गए हैं। पल-पल भारी गुजर रहा है। नेट के सक्रिय होने केबाद संभवत: पहली बार ऐसा हुआ है, जब इंटरनेट की चिड़िया जाने कहां उड़ चली है। शहरियों में अजब सी छटपटाहट है। अपना ही शहर बेगाना सा लगता है। खामोश इंटरनेट के चलते आलोचक प्रो.अकील रिजवी भी खामोशी से चले गए। इंटरनेट की चिड़िया फुर्र हो गयी है।  अब तो बस इंटरनेट का मोडम मुंह चिढ़ा रहा है। सारे कारोबार ठप हैं, यहां तक कि
गुलशन का कारोबार भी। फैज साहब याद आ रहे हैं, ‘न गुल खुले न उनसे मिले, न मय पी है,अजीब रंग में अबके बहार गुजरी है।’

नेट के बिना सर्दी का प्रकोप भी कुछ और ही अधिक लग रहा है। सच कहें तो गूंगे, बहरे और अंधे होने का बोध हो रहा है। ले-देकर एक अखबार का ही सहारा है। चैनल भी अपना-अपना राम अलाप रहे हैं। मोहब्बतों के कार्य व्यापार पर भी ग्रहण लग गया है। फेसबुक बेचेहरा हो गयी है। व्हाट्सएप चकरघिन्नी है। मोबाइल का स्क्रीन उदास है, कोरे कागज की तरह। मेसेज कहीं हवाओं में फंसे हुए हैं। अंगुलियों की चहलकदमी बंद है।
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समर्थन और विरोध की आंधी में आम आदमी की नन्हीं-नन्हीं आकांक्षाएं तिनकेकी तरह इधर-उधर हो गयी हैं। मेरी पोती चिया की तीसरी वर्षगॉंठ आ रही है। रोज वीडियो चैट पर उससे मीठी-मीठी तुतली-तुतली बातें हो रहीं थीं। इंटरनेट के जादू ने तीन साल इलाहाबाद और दिल्ली को एक कर दिया था। दिन में कई-कई बार देखते थे, चिया की मोहिनी सूरत। बीते दो दिनों से यह सुख गायब है।

बड़े बाबू का एम्स में इलाज चल रहा है। डॉक्टर से डिस्कस कर बेटे को नया नुस्खा भेजना था। नेट के बिना पिता की सांसें अटकी हुई हैं। नई बहुरिया का पति मुंबई में है, बस व्हाट्सएप कॉलिंग से ही देखादेखी होने के साथ, हाल चाल मिल पाता था, बीते दो दिनों से सब बंद है, ‘विरहन की सॉंसें फंसी, इंटरनेट की सॉंस, रह-रह चुभती जिंदगी, कौन निकाले फॉंस। सारे आंदोलनों पर मन का आंदोलन सबसे ज्यादा भारी है। रोज सुबह खैरियत लेने वाले खुर्शीद भाई लंच में मुंह लटकाए मिले तो बोले, इंटरनेट लौटे तो जैसे रूठी हुई बहार लौट आएगी।
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जो तनहाई इंटरनेट के सहारे कट जाती थी, आज खाने को दौड़ रही है। जन जीवन अस्त व्यस्त है। यू टयूब सिर पीट रहा है। हार्टअटैक की  तरह सर्वर डाउन है। तमाम लोग बेरोजगारी के आलम में है। पूरा शहर हैंग हो गया है। संवाद के तार टूटे हैं, लोग अपनों से दूर हैं। सब अपनी-अपनी डाल पर इंटरनेट की चिड़िया की बाट जोह रहे हैं। आंखों की चमक में धुंध का बसेरा है। सभी को इंटरनेट की पाखी के लौटने का बेसब्री से इंतजार है।
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