इलाहाबाद। भारत भले ही 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ लेकिन आजादी के मतवालों ने तो कुछ और सोच रखा था। देश आजाद होने से पहले स्वतंत्रता दिवस 26 जनवरी को मनाया जाता था। लोगों के बीच गुपचुप तरीके से आजादी के जश्न से जुड़े पर्चे बांटे जाते थे। अगर पर्चा अंग्रेजी हुकूमत के हाथ पड़ जाने पर आंदोलनकारियों को सीधे जेल भेज दिया जाता और अदालत में सुबूत के तौर पर ये पर्चे पेश किए जाते थे। क्षेत्रीय अभिलेखागार में मौजूद साक्ष्य इसे प्रमाणित भी करते हैं। यही वजह है कि जब देश 15 अगस्त को आजाद हुआ तो 26 जनवरी का दिन गुणतंत्र दिवस के लिए चुना गया।
क्षेत्रीय अभिलेखागार अधिकारी अमित कुमार अग्निहोत्री के मुताबिक 1930 में लाहौर में कांग्रेस अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के पूर्ण स्वराज की मांग की थी। इसी के बाद यह निर्णय लिया गया था कि 26 जनवरी को आजादी का जश्न मनाया जाएगा। उसके बाद से हर साल देशवासियों को प्रेरित करने के लिए गुपचुप तरीके से जश्न बनाने के लिए पर्चे बांटे जाने लगे। अंग्रेज आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करते और कोर्ट में साक्ष्य के रूप में इन पर्चों को पेश करते। मगर आजादी के मतवालों के इरादे इससे डगमगाए नहीं और 26 जनवरी न सही, लेकिन 15 अगस्त देश की आजादी की पठकथा लिख दी गई।
1933 में इलाहाबाद के नगर कांग्रेस कमेटी के डिक्टेटर सालिकराम जायसवाल ने कांग्रेस बुलेटिन में शहर में स्वतंत्रता दिवस मनाने का पूरा खाका तैयार किया था। जिसमें सुबह नौ बजे घंटाघर में प्रांत के डिक्टेटर पं. वेंकटेश नारायण तिवारी को झंडा फहराना था। इसके बाद शाम पांच बजे खद्दर भंडार से जुलूस और पुरुषोत्तम पार्क में सभा होनी थी। इसी दिन नगर कांग्रेस कमेटी की स्थापना भी मोहम्मद अली पार्क में की गई थी। उन्होेंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था, ‘26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाना अग्नि परीक्षा है और प्रयागराज की लाज आप के हाथ में हैं।’