पुलिस भी थी नागाओं के अधीन
मेले के समय तक पुलिस भी नागाओं के ही अधीन रहती थी। संन्यासी ही अपने धूने पर लोगों की शिकायतें सुनते और निपटारा करते थे। हार्डविक ने लिखा है कि 10 अप्रैल की सुबह मेला समाप्त हुआ। विदाई होने के साथ ही सुबह बैरागी संतों ने सिखों के साथ मिलकर सभी घाटों पर नागा साधुओं पर हमला कर दिया। उस हमले के समय ब्रिटिश फौज मूकदर्शक बनी रही।