संघ लोक सेवा आयोग की ओर से मंगलवार को घोषित सिविल सेवा के अंतिम परिणाम के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रतियोगी एक बार फिर निराशा हैं। एक समय इलाहाबाद सिविल सेवा का गढ़ हुआ करता था। हर साल यहां के 50 से अधिक प्रतियोगी देश की इस सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होते रहे। 2008 में यहां के 76 प्रतियोगी इस परीक्षा में सफल हुए थे, लेकिन अब संगमनगरी की यह पहचान खोती जा रही है। लगातार पांच साल से सफलता का ग्राफ गिरता जा रहा है। प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट को क्वालीफाइंग पेपर करने के बाद भी निराशाजनक प्रदर्शन से प्रतियोगियों को गहरा धक्का लगा है।
इसके पीछे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के गिरते स्तर को बड़ा कारण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व में बड़ी सफलता के पीछे विश्वविद्यालय की फैकेल्टी और उसकी परंपराएं आधार रहीं, लेकिन अब पढ़ाई शोधार्थियों के भरोसे है। विशेषज्ञों और प्रतियोगियों का कहना है कि विश्वविद्यालय जब शीर्ष पर था तब यहां के छात्रों का सिविल सेवा भर्ती में दबदबा था, लेकिन विश्वविद्यालय के माहौल में गिरावट के साथ संगमनगरी की यह हनक भी कम होती गई।
प्रतियोगी दिनेश वैश्य का कहना है कि पहले विश्वविद्यालय में सिविल सेवा के पैटर्न और सिलेबस को ध्यान में रखकर पढ़ाया जाता था। इसके अलावा विशेष कक्षाएं भी चलाई जाती थीं। ऐसे में स्नातक में ही विद्यार्थी का आधार तैयार हो जाता था। इसके अलावा विश्वविद्यालय और हॉस्टलों में होने वाली गोष्ठियां तथा अन्य शैक्षणिक गतिविधियां मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार में मदद करती थीं। संजय पांडेय का कहना है अब यह परंपराएं खत्म हो गई हैं। काउंसलर रनीश जैन का कहना है कि अब विश्वविद्यालय की शिक्षा शोधार्थियों के भरोसे है। पूरा माहौल बिगड़ गया है। सिविल सेवा में निराशाजनक प्रदर्शन के पीछे यह मुख्य वजह है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्टूडेंट एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन प्रोफेसर जटाशंकर का कहना है कि इस बार का परिणाम निराशाजनक है, जो सफल हुए हैं, उन्होंने भी बाहर पढ़ाई की है। इसके लिए यहां पूरा परिवेश और शैक्षिक व्यवस्था जिम्मेदार है। दिल्ली एक नए सेंटर के रूप में उभरा है।
यहां की व्यवस्था एजूकेशन पॉलिसी और सिविल सेवा भर्ती में हुए बदलाव के अनुरूप ढल नहीं पाई है। विश्वविद्यालय में शिक्षा के स्तर की गिरावट सभी लोग महसूस कर रहे हैं। निश्चित यह भी एक बड़ा कारण है। उन्होंने कहा कि जो माहौल है उसमें किसी तरह के सकारात्मक बदलाव की बात करना जल्दबाजी होगी। ऑफलाइन के मुद्दे पर जिस तरह से राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ है वह अच्छा संकेत नहीं है। ऑफलाइन का विकल्प मिलना चाहिए लेकिन 20 से 22 साल का युवा ऑनलाइन का विरोध करे यह ठीक नहीं है। वर्तमान समय में इसके अनुरूप खुद को तैयार करना उसकी मजबूरी है। सकारात्मक बदलाव के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत होगी।