1783-84, 1803-04 एवं 1817 में देश पर पड़े अकाल के बीच बंगाल क्षेत्र में प्लेग फैला था, इसका कुछ असर जिले पर भी पड़ा था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो.डीपी दुबे ने बताया कि 1899 में देश पर पड़े अकाल की मार के चलते मुंबई के भिमंडी क्षेत्र में प्लेग फैलने से वहां रहने वाले मऊआइमा क्षेत्र के बुनकर (जुलाहे) भागकर अपने घर चले आए।
मुंबई से आए प्लेग से बीमार बुनकरों के कारण पूरा मऊआइमा, फूलपुर क्षेत्र प्लेग जैसी महामारी की चपेट में आ गया। इसमें हजारों की संख्या में लोग इस महामारी में मारे गए। इस बीमारी ने पूरे गंगापार क्षेत्र को प्रभावित किया, इस बीमारी से जिले के लोगों को उबरने में लोगों को कई वर्ष लग गए। देश को आजाद हुए अभी चार वर्ष ही हुए थे कि 1951 में अप्रैल में इलाहाबाद शहर में प्लेग फैल गया। इसका प्रभाव धीरे-धीरे गांव तक फैल गया।
प्लेग जैसी बीमारी के चलते जिले में आसपास के कौशांबी, फतेहपुर एवं प्रतापगढ़ में हजारों की संख्या में लोग मौत के मुंह में चले गए। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण का कहना है कि 1920 के आसपास इलाहाबाद में चेचक (छोटी माता) जैसी जानलेवा बीमारी बहुत तेजी से फैली थी, इसकी चपेट में आकर बड़ी संख्या में बच्चे मौत के मुंह में चले गए थे। उन्होंने बताया कि तत्कालीन इलाहाबाद जिले में शामिल और वर्तमान में कौशांबी के कड़ा में स्थित शीतला माता के मंदिर में छोटी माता की पूजा का प्रचलन स्थानीय लोगों में बहुत अधिक था।