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Allahabad High Court : लंबे समय तक सहमति से रिश्ता रहा तो बाद में शादी न करना अपराध नहीं, दीर्घावधि स्वेच्छा

Fri, 30 Jan 2026 05:34 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दो वयस्क सहमति से लंबे समय तक संबंध बनाए रखते हैं तो बाद में विवाह का वादा पूरा न होने मात्र से उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दो वयस्क सहमति से लंबे समय तक संबंध बनाए रखते हैं तो बाद में विवाह का वादा पूरा न होने मात्र से उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-69 के तहत शादी के झूठे वादे पर संबंध बनाने के मामले में ट्रायल कोर्ट में चल रही मुकदमे की कार्यवाही रद्द कर दी।

अलीगढ़ के गांधी पार्क थाने में जितेंद्र कुमार पर 2021 से 2014 तक शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाने व गर्भपात कराने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोपी के भाई और भाभी पर धमकी देने का आरोप था। आरोपियों ने चार्जशीट, संज्ञान आदेश सहित मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग में हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि पीड़िता और आरोपी के बीच पढ़ाई के दौरान से ही प्रेम संबंध थे। दोनों वयस्क हैं और सहमति से संबंध में थे। पीड़िता ने आरोपी से 10 लाख रुपये की मांग की। रुपये नहीं देने पर झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई। वहीं, प्रतिवादी अधिवक्ता ने दलील दी कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाए।

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कोर्ट ने कहा- आरोपी के खिलाफ कोई स्पष्ट आपराधिक मामला नहीं बनता

हाईकोर्ट ने कहा कि युवक और पीड़िता युवती के बीच संबंध कॉलेज के दिनों (2015-16) से शुरू हुए थे। दोनों के बीच विवाह का आपसी वादा भी था। युवक ने 2021 में नौकरी लगने के बाद फिर से शादी का आश्वासन दिया था। ऐसे में शुरुआती वादे को छल या बुरी नीयत से किया गया झूठा वादा साबित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि जब दो समझदार वयस्क वर्षों तक सहमति से शारीरिक संबंध कायम रखते हैं तो मान लिया जाता है कि इसमें उनकी स्वेच्छा थी। बाद में विवाह न हो पाने को दंडनीय अपराध नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने पीड़िता के बयानों और मामले के तथ्यों का विश्लेषण करने के बाद पाया कि इसमें आरोपी के खिलाफ कोई स्पष्ट आपराधिक मामला नहीं बनता। ऐसे में अर्जी स्वीकार करते हुए मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द कर दी।

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