बीएचयू और एम्स में भी हो चुका है शोध
वाराणसी के बीएचयू मेडिकल कॉलेज व दिल्ली के एम्स अस्पताल में भी इसी विषय पर शोध हो चुका है। जिसमें गॉल ब्लैडर के कैंसर के संबंध में समय पर जानकारी होने के लिए पित्त की थैली में पथरी, लीवर इन्फेक्शन व टाइफाइड होने की दशा में मरीज के बायोप्सी और इन्फेक्शन के कल्चर की जांच होना जरूरी माना गया।
समय रहते पता नहीं चलता कैंसर
गॉल ब्लैडर का कैंसर शुरुआती दौर में पता नहीं चलता है, क्योंकि इस दौरान मरीज को कोई समस्या नहीं होती है। जब मरीज को भीषण पेट दर्द या फिर अन्य दिक्कत होती है, तब जांच में कैंसर की बात सामने आती है। तब तक मरीज का कैंसर एडवांस स्टेज में पहुंच जाता है। ऐसे में मरीज को बचा पाना मुश्किल होता है।
गंगा किनारे के इलाकों में गॉल ब्लैडर के कैंसर की समस्या अधिक देखने को मिलती है। यह महिलाओं में अधिक होता है। समय रहते कैंसर का पता चले, इसके लिए बायोप्सी और इन्फेक्शन के कल्चर की जांच होना जरूरी है। - डॉ. देव कुमार यादव, असिस्टेंट प्रोफेसर, रेडियोथेरेपी एवं कैंसर विभाग, मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज