मानवाधिकार आयोग मानवाधिकार हनन के पीड़ित को मुआवजा दिलाने के लिए दोषी पाए गए पुलिसकर्मियों से सीधे वसूली नहीं कर सकता है। आयोग को सिर्फ संस्तुति करने का अधिकार है। पुलिस के अधिकारी भी आयोग के आदेश पर मुआवजा वसूल नहीं कर सकते हैं। यदि आयोग किसी प्रकार की वसूली का आदेश देता है तो इसे पुलिसकर्मियों की दंड एवं अपील नियमावली की धारा 14 (1) के तहत विभागीय कार्यवाही पूरी करने के बाद ही वसूला जा सकता है। हाईकोर्ट ने यह व्यवस्था देते हुए गौतमबुद्ध नगर के दो उपनिरीक्षकों पर लगाए गए 75-75 हजार रुपये वसूल करने का आदेश निरस्त कर दिया है। वसूली का आदेश मानवाधिकार आयोग ने दिया था।
उपनिरीक्षक सत्यपाल सिंह सिसौदिया और नरेंद्र प्रसाद की याचिका पर न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी ने सुनवाई की। याची के अधिवक्ता विजय गौतम की दलील थी कि आयोग को दोषी पुलिसकर्मियों से हर्जाना वसूल करने का अधिकार नहीं है। उसे सिर्फ संस्तुति करने का अधिकार है। अधिवक्ता की दलील थी कि उत्तर प्रदेश अधीनस्थ अधिकारियों की दंड एवं अपील नियमावली 1991 के तहत ही दोषी पाए गए कर्मचारी को सुनवाई का मौका देने के बाद ही वसूली की जा सकती है।
प्रकरण गौतमबुद्ध नगर का है। कासना के डा. सुधीर चंद्रा के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया था। उन्होंने पुलिसकर्मियों पर गलत व्यवहार करने और विवेचना में लापरवाही की शिकायत आयोग से की। आयोग ने दोनों उपनिरीक्षकों को दोषी पाते हुए एक फरवरी 2017 को डेढ़ लाख रुपये मुआवजा डा. सुधीर चंद्रा को देने का निर्देश दिया। इसके बाद विशेष सचिव गृह के निर्देश पर एसएसपी गौतमबुद्ध नगर ने दोनों उपनिरीक्षकों से 75-75 हजार रुपये वसूल करने का आदेश जारी किया। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि नियमानुसार विभागीय कार्यवाही के बाद ही हर्जाना वसूला जा सकता है।