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प्रयागराज : अपने ही शहर में बेगाने हुए हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, एक प्रतिमा तक न लग सकी

Mon, 29 Aug 2022 08:04 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

117 साल बाद राष्ट्रीय खेल दिवस की पूर्व संध्या पर मेजर ध्यानचंद के घर का पता जानने की कोशिश की गई, तब हर तरफ स्मृतियों की धुंध छाई मिली। उनके नाम पर न कोई स्मारक बन सका है न स्टेडियम। किसी स्टेडियम में प्रतिमा तक नहीं लगाई जा सकी है।
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मेजर ध्यानचंद - फोटो : Sportskeeda.com
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विस्तार
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संगम की जिस भूमि पर हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की किलकारियां गूंजीं, जिन गलियों में खेलते हुए उनका बचपन बीता, वह अपने ही शहर में अनजानी हो गई हैं। हालत यह है कि अब शहर के खिलाड़ी राष्ट्रीय खेल के महानायक का मुहल्ला तक नहीं बता पा रहे हैं। इसकी वजहें भी एक नहीं, कई हैं। 

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117 साल बाद राष्ट्रीय खेल दिवस की पूर्व संध्या पर मेजर ध्यानचंद के घर का पता जानने की कोशिश की गई, तब हर तरफ स्मृतियों की धुंध छाई मिली। उनके नाम पर न कोई स्मारक बन सका है न स्टेडियम। किसी स्टेडियम में प्रतिमा तक नहीं लगाई जा सकी है। आजादी के अमृत महोत्सव के क्रम में नगर निगम ने 23 चौराहों, तिराहों, पुलों का नामकरण शहीदों के अलावा राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाली विभूतियों के नाम पर रखने का निर्णय लिया था, लेकिन इस सूची में भी मेजर ध्यान चंद्र को कहीं जगह नहीं मिल सकी। 

नगर निगम में नहीं लाया जा सका प्रस्ताव

नगर निगम की नामकरण समिति के चेयरमैन अखिलेश सिंह बताते हैं कि जब यह प्रस्ताव सदन में लाया जा रहा था, तब किसी भी सदस्य की ओर से मेजर ध्यानचंद का जिक्र तक नहीं किया गया। ऐसे में उनका नाम इस सूची में शामिल नहीं किया जा सका। शहर के किस मुहल्ले में मेजर ध्यानचंद का जन्म हुआ, और वह किस मकान में रहते थे, इस पर भी अभी खिलाड़ी एकमत नहीं हैं। उनके साथ समय बिता चुके नेशनल हॉकी खिलाड़ी 85 वर्षीय श्याम बाबू गुप्ता बताते हैं कि उनका जन्म मुट्ठीगंज मुहल्ले में हुआ था।

शहर के किस मुहल्ले में जन्मे इस पर भी मतभेद

ध्यानचंद के पिता समेश्वर दत्त सिंह तब सेना के वाटर वर्क्स में लिपिक के पद पर प्रयागराज में तैनात थे। ध्यानचंद से श्याम बाबू की मुलाकात ग्वालियर में तब हुई थी जब वह मध्य भारत और इंडियन ऑडिट टीम की ओर से खेलने गए थे। वह बताते हैं कि तब मेजर ध्यानचंद के भाई रूप सिंह उनकी टीम के कोच थे। 


इस तरह मेजर ध्यानचंद के साथ रह चुके नेशनल हॉकी खिलाड़ी राम बाबू गुप्ता को भी उनका मुहल्ला अब ठीक से याद नहीं रहा। हॉकी संघ की सेक्रेटरी पुष्पा श्रीवास्तव भी बताती हैं कि वह लखनऊ में स्पोर्ट्स डायरेक्टर रहे बाबू केडी सिंह की मौजूदगी में हॉस्टल में दो बार मेजर ध्यानचंद से मिली थीं, लेकिन शहर के किस मुहल्ले में वह रहते थे, उन्हें पता नहीं है।


इलाहाबाद डिस्ट्रिक्ट फुटबाल एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके नारायण गोपाल दावा करते हैं कि मेजर ध्यानचंद जिस किराये के मकान में अपने पिता के साथ रहते थे, वह कचरा मुहल्ले में था। काली माई की थान वाली गली अब भी नेतराम चौराहे से लक्ष्मी टॉकीज की ओर बढ़ने पर दाहिने हाथ मुड़ती है। उसी गली में मेजर ध्यानचंद रहते थे।
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मेजर ध्यान चंद के नाम पर स्टेडियम की स्थापना हो, चौराहे पर लगाई जाए मूर्ति
प्रयागराज। मेजर ध्यानचंद की स्मृतियों को सहेजने के लिए संगम के शहर से आवाज उठने लगी है। मेजर रंजीत सिंह स्पोर्ट्स स्टेडियम के उपाध्यक्ष (प्रशासन) आरपी भटनागर कहते हैं कि शहर में मेजर ध्यानचंद के नाम पर स्टेडियम बनना चाहिए। 


इसी तरह नेशनल हॉकी खिलाड़ी श्यामबाबू गुप्ता चाहते हैं कि मेजर ध्यानचंद की प्रतिमा शहर के किसी चौराहे पर या फिर कंपनी बाग में लगाई जाए। वरिष्ठ खेल पत्रकार इंद्रकांत मिश्र ने शहर की एक सड़क या चौराहे का नाम उनके नाम पर करने की आवाज उठाई है। डिस्ट्रिक्ट फुटबाल संघ के अध्यक्ष रहे नारायण गोपाल कहते हैं कि मेजर ध्यान चंद के नाम पर स्टेडियम की स्थापना सरकार को करनी चाहिए।
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