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सिविल सेवा में हिंदी पट्टी वालों को फिर झटका

Thu, 23 Feb 2017 02:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
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ias officer - फोटो : ias officer
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सिविल सेवा मुख्य परीक्षा-2016 में भी हिंदी पट्टी के प्रतियोगियों को झटका लगा है। साक्षात्कार के लिए क्वालीफाई करने वाले इलाहाबाद के अभ्यर्थियों की संख्या ना के बराबर है। इविवि के छात्रावासों में तो घोर निराशा है। यही हाल डेलीगेसी के प्रतियोगियों में भी है। मुख्य परीक्षा के रिजल्ट के बाद यह आशंका बन गई है कि अंतिम परिणाम में यहां के प्रतियोगियों का हाथ बिल्कुल ही खाली न रह जाए।
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सिविल सेवा 2007, 2008 में यहां के 50 से अधिक प्रतियोगियों का अंतिम रूप से चयन हुआ था। इसके बाद भी यहां के अभ्यर्थियों ने अच्छी सफलता हासिल की, लेकिन 2011 में सीसैट लागू होने तथा फिर मुख्य परीक्षा के प्रारूप में बदलाव के बाद हिंदी पट्टी के प्रतियोगियों की सफलता का ग्राफ लगातार गिरता गया। इसके विपरीत अंग्रेजी माध्यम तथा बीटेक डिग्रीधारी प्रतियोगियों का दबदबा बढ़ता गया। पूरे देश में इसके खिलाफ लगातार आंदोलन के बाद सीसैट को क्वालीफाइंग पेपर करने के अलावा कई अन्य बदलाव किए गए।

इसके बावजूद यहां के प्रतियोगियों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इस बार तो स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। आईएएस फैक्ट्री के नाम से मशहूर एएन झा हॉस्टल में पूरी तरह से सन्नाटा है। हॉस्टल से निकले पांच छात्रों ने मुख्य परीक्षा दी थी, लेकिन बुधवार तक प्राप्त जानकारी के अनुसार किसी की सफलता की सूचना नहीं थी। यही स्थिति अन्य छात्रावासों की भी रही। मुख्य परीक्षा का रिजल्ट निकलने पर मनमोहन पार्क पर भी उत्साह का माहौल हुआ करता था, लेकिन बुधवार को वहां जुटे प्रतियोगियों में घोर निराशा थी। ज्यादातर कोचिंग संस्थानों में भी निराशा का माहौल है।
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‘इस साल कुछ ज्यादा ही निराशा दिख रही है। किसी के सफल होने की अभी तक सूचना नहीं मिली है। इसका मुख्य कारण इविवि में पढ़ाई का गिरता स्तर है। विश्वविद्यालय और छात्रावासों में सिविल सेवा की तैयारी का आधार तैयार होता था, लेकिन पढ़ाई का माहौल लगातार गिरता जा रहा है। उसका असर सिविल सेवा के रिजल्ट पर दिख रहा है। इसके अलावा यहां के ज्यादातर कोचिंग संस्थान में योग्य शिक्षक ही नहीं हैं। संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व चेयरमैन बीके अग्रवाल ने भी कहा था कि यहां के कोचिंग संस्थानों में योग्य शिक्षक नहीं हैं। पुराना गौरव स्थापित करना है तो हर पहलू पर विचार करना होगा।’
प्रोफेसर बीएन सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष, भूगोल-इविवि

एक समय सिविल सेवा में इलाहाबाद के प्रतियोगियों का दबदबा हुआ करता था। इस सफलता के पीछे इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा छात्रावासों का माहौल हुआ करता था। छात्रावासाें में सिविल सेवा को ध्यान में रखकर गोष्ठी, व्याख्यान आदि का आयोजन होता था, लेकिन अब परिसर की उठापठक में होनहारों के सपने दफन हो रहे हैं। यहां के प्रतियोगियों के लिए अंग्रेजी बड़ी बाधा है। इसे दूर करने के लिए विश्वविद्यालय में स्नातक में अंग्रेजी की पढ़ाई अनिवार्य करने के साथ अतिरिक्त कक्षाएं चलाने का निर्णय लिया गया। विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के साथ सिविल सेवा के सिलेबस तथा परीक्षा प्रारूप के अनुसार पढ़ाई का भी प्रस्ताव तैयार किया गया, लेकिन वर्षों से ये बातें फाइलों में ही दबी हैं।

खास यह कि  छात्रसंघ चुनाव में भी यह लगातार मुद्दा बना, लेकिन जीतने के बाद पदाधिकारी सबकुछ भूल गए। इसके विपरीत परिसर तथा छात्रावास सियासी और अराजक तत्वों के लिए मुफीद हो गए हैं। शिक्षकों के साढ़े पांच से अधिक पद खाली हैं। जो शिक्षक हैं उनमें भी कई नियमित कक्षाएं नहीं लेते। कुलपति खुद इस हालात से रूबरू हो चुके हैं। बीए तृतीय वर्ष के छात्र पंकज, अमित का कहना है कि उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी के मकसद से विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था लेकिन नाउम्मीदी मिली। उनकी ज्यादातर कक्षाएं शोधछात्र लेते हैं।

सिविल सेवा मुख्य परीक्षा का प्रारूप बदल दिया गया है। सिविल सेवा में एक वैकल्पिक विषय है। इसके विपरीत पीसीएस में अब भी पुराना पैटर्न लागू है। इसके तहत अभ्यर्थियों को दो वैकल्पिक विषय चुनने होते हैं। इस तरह से एक ही तरह की दो भर्ती परीक्षाओं के लिए प्रतियोगियों को दोहरी तैयारी करनी पड़ती है। अन्य राज्यों के प्रतियोगियों से पिछड़ने के पीछे इसे बड़ा कारण माना जा रहा है। प्रतियोगियों के लगातार आंदोलन के बाद उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने पिछले साल सिविल सेवा का प्रारूप पीसीए में भी लागू करने का प्रस्ताव शासन को भेजा था, लेकिन सरकार ने उसे वापस कर दिया।

इसके बाद प्रतियोगियों का फिर से दबाव बढ़ने पर आयोग ने पीसीएस-2017 से सिविल सेवा का प्रारूप लागू करने का निर्णय लिया। इसके लिए कार्यशाला भी आयोजित की गई, लेकिन विधानसभा चुनाव की वजह से प्रस्ताव शासन को नहीं भेजा सका। ऐसे में पीसीएस-2017 में भी पुराना पैटर्न लागू है। यानी, प्रतियोगियों को एक साल और तैयारी के लिए दोहरी रणनीति बनानी पड़ेगी। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अवनीश पांडेय का कहना है कि भर्ती संस्थाओं में अनियमितता की वजह से भी अभ्यर्थियों में निराशा है। उनका ज्यादातर समय आंदोलनों और कानूनी लड़ाई में जाया हो रहा है।
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