न्यायालय में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के इरादे से गुरुवार को हिंदी दिवस पर हाईकोर्ट ने तीन निर्णय हिंदी में दिए हैं। न्यायमूर्ति शशिकांत द्वारा दिए इन निर्णयों को वकीलों के बीच काफी सराहा जा रहा है। उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अभी अंग्रेजी ही आधिकारिक भाषा के रूप में प्रयोग हो रही है, हालांकि इससे पूर्व भी कई न्यायाधीश हिंदी में निर्णय दे चुके हैं। इनमें न्यायमूर्ति स्व. प्रेमशंकर गुप्त का नाम उल्लेखनीय है। गुरुवार को न्यायमूर्ति शशिकांत ने एक 482 दंड प्रक्रिया संहिता और दो जमानत प्रार्थनापत्रों पर हिंदी में निर्णय सुनाए हैं। उन्होंने आगे भी हिंदी निर्णय लिखाने का क्रम जारी रखने का निश्चय किया है।
अपने चैंबर में संवाददाताओं से अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा कि हिंदी में निर्णय देने का मन उन्होंने बहुत पहले बनाया था। हिंदी दिवस इसके लिए सबसे उपयुक्त लगा। हालांकि हाईकोर्ट में हिंदी के स्टेनों की कमी है, न्यायिक भाषा को लेकर भी दिक्कतें आती हैं, इसके बावजूद सप्ताह में कम से कम एक निर्णय हिंदी में लिखाने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि न्यायालय की भाषा भी आम लोगों के बोलचाल की भाषा होनी चाहिए। हिंदी में निर्णय देने का सबसे अधिक लाभ यह है कि अंग्रेजी नहीं जानने वाली जनता भी इसे समझ सकेगी। विशेषकर राजस्व न्यायालयों को हिंदी का प्रयोग अधिक करना चाहिए क्योंकि राजस्व के मुकदमे आम आदमी और किसानों के मुकदमे होते हैं।
न्यायमूर्ति शशिकांत ने मेसर्स नागदेव संस और अन्य के मुकदमे का निर्णय हिंदी में सुनाते हुए याचिका मंजूर कर ली है और उसके विरुद्ध पारित अवर न्यायालय के आदेश को खंडित कर दिया है। शेष दो निर्णय अभी प्रक्रिया में हैं।
न्यायालय की भाषा को आम आदमी की भाषा से जोड़ने की आवश्यकता है, इससे आम आदमी भी न्यायिक निर्णयों को समझकर उसका लाभ उठा सकेगा। - न्यायमूर्ति शशिकांत
हिंदी में पहला निर्णय हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति कुंवर बहादुर अस्थाना ने दिया था। उन्होंने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई करते हुए हिंदी में निर्णय दिया। इसके बाद आपातकाल के दौरान पांच जजों की पीठ में बैठकर उन्होंने अपना निर्णय हिंदी में ही लिखाया। इसके बाद न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त, न्यायमूर्ति कमलेश्वरनाथ, न्यायमूर्ति गौरी शंकर त्रिपाठी, न्यायमूर्ति रामभूषण मेहरोत्रा, न्यायमूर्ति श्रीनाथ सहाय, न्यायमूर्ति दिनेश कुमार त्रिवेदी, न्यायमूर्ति बनवारी लाल यादव और न्यायमूर्ति रामसूरत सिंह सहित तमाम जजों ने हिंदी में फैसले सुनाए हैं।
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति महेश नारायण और न्यायमूर्ति गोपीनाथ की खंडपीठ ने फैसले में कहा है कि हाईकोर्ट में हिंदी में बहस और सुनवाई हो सकती है तथा निर्णय सुनाया जा सकता है। अधिवक्ता दयाशंकर मिश्र बताते हैं कि सुप्रीमकोर्ट ने भी मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा हिंदी के शपथपत्र को अस्वीकार करते हुए कहा है कि हिंदी में दाखिल शपथपत्र स्वीकार्य है।
हाईकोर्ट के अधिवक्ता दयाशंकर मिश्र सिर्फ हिंदी में ही याचिकाएं दाखिल करते हैं और हिंदी में ही बहस करते हैं। वह दशकों से ऐसा करते आ रहे हैं। हिंदी की इस सेवा के लिए उनको राज्य सरकार द्वारा और विश्व हिंदी सम्मेलन भोपाल में सम्मानित किया जा चुका है।