याची से दो करोड़, 71 लाख, 49 हजार, 536 रुपये वसूले जाने थे। बाद में याची और कंपनी के बीच आपसी समझौता हो गया और याची ने समझौते के आधार पर ड्राफ के माध्यम से एक करोड़, नौ लाख, 77 हजार रुपये अदा कर दिए। लोन की रकम मिलने के बाद कंपनी की ओर से लोन रकम जमा होने का प्रमाणपत्र जारी किया गया।
याची के अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने तर्क दिया कि लोन जमा होने का प्रमाणपत्र डीएम और संबंधित तहसील अथॉरिटी को सौंप दिया गया। बावजूद, इसके पूरी रकम पर 10 फीसदी रकम बतौर रिकवरी चार्ज (10 लाख, 97 हजार, 700 रुपये) वसूल की गई। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने इसे गलत मानते हुए संबंधित तहसील अथॉरिटी की ओर से बतौर रिकवरी चार्ज की गई रकम को वापस करने का आदेश दिया।