यह है मामला
21 मई को एक महिला अपनी बेटी के साथ चेंजिंग रूम में कपड़े बदलने गई थी, जहां वह सीसीटीवी कैमरा देखकर दंग रह गई। उसे पता चला कि यह कैमरा महंत के मोबाइल फोन से कनेक्ट है तो वह उसके पास पहुंच गई और सवाल जवाब करने लगी। आरोप है कि इस पर महंत ने उस महिला को धमकी दी कि अगर वह पुलिस से शिकायत करेगी तो ठीक नहीं होगा। उसके बाद से महंत फरार है।
आरोपी महंत गिरफ्तारी से बचने के लिए पहुंचा हाईकोर्ट
पुलिस की कार्रवाई के बीच फरार महंत गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट पहुंचा है। महंत की ओर से दाखिल अग्रिम जमानत पर याचिका पर अदालत ने पांच जुलाई को सरकार से जवाबी हलफनामा तलब करते हुए महंत के खिलाफ मिले सबूतों का खुलासा करने का आदेश दिया था। जिसके क्रम में मुरादनगर के उपनिरीक्षक रामपाल सिंह ने 15 जुलाई को हलफनामा तो दाखिल किया और बतौर सबूत न्यूज पेपर की कटिंग और महिला आयोग का पत्र संलग्न किया है।
विवेचना अधिकारी ने उन जांच के दौरान मिले वीडियो फुटेज जैसे तमाम सबूतों का खुलासा नहीं किया। जबकि शिकायतकर्ता के वकील ने जांच के दौरान मिले सुबूतों की जानकारी अदालत को दी। अदालत ने हैरानी जताते हुए कहा कि जांच करनें वाली पुलिस सुबूतों के बिंदु पर खामोश है, जबकि शिकायतकर्ता को सबकुछ मालूम है।
पुलिस आयुक्त भी न बता पाए क्यों छिपाए सुबूत
अदालत ने लापरवाही से दाखिल हलफनामे पर पुलिस आयुक्त गाजियाबाद से व्यक्तिगत हलफनामा तलब करते हुए पूछा था कि आखिर कोर्ट के आदेश के बावजूद हलफनामे में आरोपी के खिलाफ मिले सबूतों का खुलासा क्यों नहीं किया गया।
जवाब में 23 अगस्त को पुलिस आयुक्त ने हलफनामा दाखिल कर यह तो बताया कि लापरवाही पूर्ण हलफनामा दाखिल करने वाले उपनिरीक्षक रामपाल सिंह के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी गई है, लेकिन यह बताने में विफल रहे कि अदालत के आदेश के बावजूद सुबूत का खुलासा पिछले हलफनामे में क्यों नहीं किया गया।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी...डाकघर में तरह काम कर रहा अभियोजन कार्यालय
कोर्ट ने दस्तावेजों का अवलोकन करते हुए तल्ख टिप्पणी की। कहा अभियोजन निदेशक का कार्यालय डाकघर जैसे काम कर रहा है। अदालत के समक्ष हलफनामा तैयार करने के तीन स्तर है; पहला पुलिस विभाग, दूसरा अभियोजन निदेशक कार्यालय और तीसरा शासकीय अधिवक्ता कार्यालय, लेकिन मौजूदा मामले में अदालत के आदेश के बावजूद जिस तरह से तथ्यों और सबूतों को छुपाने और दबाने की कोशिश की गई है, इससे जाहिर है कि जिम्मेदार अधिकारी पीड़ित को न्याय दिलाने में रुचि नहीं रखते।
अदालत के पास इनके खिलाफ जांच कराने का आदेश देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है, क्योंकि, अदालत के समक्ष तथ्य और साक्ष्य का खुलासा न करना न्याय व्यवस्था में हस्तक्षेप है। राज्य के किसी भी अधिकारी को इस न्यायालय के समक्ष लंबित विवाद के निर्णय के लिए प्रासंगिक तथ्य और विवरण को छिपाकर हलफनामा दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लिहाजा, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी से बिंदुवार जांच करवा कर सीलबंद जांच रिपोर्ट पेश करें।
भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी है इनामी महंत की पत्नी
आरोपी महंत की पत्नी नीरू गाजियबाद के मुरादनगर नगर पंचायत से वर्ष 2007 में भाजपा के टिकट पर अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुकी हैं। इसके बाद 2017 महंत मुकेश खुद आम आदमी पार्टी के टिकट पर अध्यक्ष पद के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया था, हालांकि उसने मतदान पहले ही भाजपा प्रत्याशी को अपना समर्थन दे दिया।