याची के वकील ने कहा- मोबाइल हैक कर की गई थी पोस्ट
आवेदक के वकील ने कहा कि आवेदक को झूठा फंसाया गया है, क्योंकि उसने खुद टिप्पणी पोस्ट नहीं की है, बल्कि यह टिप्पणी उसके अकाउंट को हैक करने के बाद की गई है। आगे कहा कि कथित टिप्पणी कोई अपराध नहीं है, बल्कि यह एक सहज बयान है। आवेदक के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है और इसलिए शुरू की गई सभी कार्यवाही रद्द कर दी जानी चाहिए। वहीं, अपर शासकीय अधिवक्ता शशिधर पांडे ने आवेदन का पुरजोर विरोध किया और तर्क दिया कि जांच के बाद इस मामले में आरोप पत्र दायर किया गया है। कहा कि आवेदक की टिप्पणी अपमानजनक थी और इससे धार्मिक भावना को ठेस पहुंची थी। इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
बोलने की स्वतंत्रता का इस्तेमाल दूसरे के अपमान के लिए नहीं हो सकता
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसल का जिक्र किया, जिसमें इस बात पर जोर दिया कि बोलने की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और इसे दूसरों की भावनाओं का उल्लंघन करने के लाइसेंस के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। आगे कहा कि वर्तमान मामले में शिवलिंग पर की गई टिप्पणी स्पष्ट रूप से आवेदक द्वारा दूसरे समुदाय की धार्मिक भावनाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण इरादे को दर्शाती है। इस तरह की कार्रवाई को भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत निहित अधिकार का जामा नहीं पहनाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि मुकदमा पूरी तरह से गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए, इसलिए, सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर तत्काल आवेदन पर विचार नहीं किया जा सकता है और आवेदन खारिज कर दिया।