कोर्ट ने कहा कि यह चौंकाने वाला है कि विकास प्राधिकरण ने क्षेत्र के निवासियों की सुरक्षा और अधिकारों के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। स्वीकृत सीमा से अधिक बेसमेंट निर्माण से न केवल याची के मकान की नींव को नुकसान पहुंच सकता है, बल्कि इससे मानव जीवन को भी खतरा उत्पन्न हो सकता है। पीडीए ने परिसर को दोबारा तब सील किया, जब हाईकोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया। इस पर कोर्ट ने प्राधिकरण के रवैये पर नाराजगी जताई। प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को तलब किया गया, जिन्होंने स्वीकार किया कि निर्माण कंपाउंडिंग की सीमा से बाहर था। इसके बावजूद प्रतिवादियों को मानचित्र कंपाउंड कराने का एक और अवसर दिया गया।
जब प्रतिवादियों के अधिवक्ता ने ध्वस्तीकरण आदेश को अलग से चुनौती देने की बात कही तो अदालत ने इस रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि न्यायालय कानून का पालन करने वाले नागरिकों के लिए होते हैं। न कि उन लोगों के लिए जो कानून में विश्वास नहीं रखते और बेखौफ होकर उसका उल्लंघन करते हैं।
कोर्ट ने अंतिम अवसर देते हुए निर्देश दिया कि कंपाउंडिंग की सीमा से बाहर के अवैध निर्माण को तत्काल गिराया जाए। वहीं, शेष निर्माण को नियमों के अनुरूप कंपाउंड कराया जाए। साथ ही सख्त चेतावनी दी कि यदि अगली तारीख तक कार्रवाई नहीं हुई तो वर्तमान और पूर्व उपाध्यक्ष-जिनके आदेश से डी-सीलिंग हुई दोनों से स्पष्टीकरण तलब किया जाएगा। इसके साथ ही वर्तमान उपाध्यक्ष को 18 दिसंबर को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का आदेश दिया है।