इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता सुरेश कुमार मौर्य ने दलील दी कि विभागीय सेवा नियमावली ने चेतावनी दंड के रूप में परिभाषित नहीं है। लिहाजा इसको सजा मान कर याची को निलंबन व बर्खास्तगी अवधि के दौरान काम न करने का हवाला देकर वेतन और भत्ते से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने मेरठ के मंडलायुक्त की ओर से 2015 में पारित अपीलीय आदेश और अन्य संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया है। कहा कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली-1999 के तहत चेतावनी कोई निर्धारित दंड नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब अनुशासनात्मक कार्यवाही समाप्त हो जाती है और कर्मचारी को किसी दंड का भागी नहीं पाया जाता तो यह माना जाएगा कि कर्मचारी सदैव कार्य करने के लिए तैयार और इच्छुक था। यह विभाग की गलती थी, जिसने अपनी अनुशासनात्मक कार्रवाई के दौरान निलंबन और बर्खास्तगी के जरिये कर्मचारी को जबरन काम से दूर रखा। ऐसी स्थिति में काम नहीं तो वेतन नहीं का सिद्धांत लागू नहीं होता। क्योंकि, कर्मचारी को काम करने से विभाग ने रोका था।