अपीलार्थी शमशेर अली को दुष्कर्म समेत कई अन्य धाराओं में संत कबीर नगर के परीक्षण न्यायालय ने दस जनवरी 2014 को दुष्कर्म के लिए दस वर्ष और अन्य अपराधों के लिए सात वर्ष की सजा सुनाई थी, लेकिन सजा सुनाते वक्त अदालत ने सजा के संचालन की विधि का निर्धारण नहीं किया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि विचारण न्यायालय को अधिकतम सजा सुनने का अधिकार है। इसका प्रयोग विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति ज्योत्सना शर्मा ने संत कबीर नगर के शमशेर अली की अपील निस्तारित करते हुए कहा, मामले में अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ सजाएं चलेंगी।
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अपीलार्थी शमशेर अली को दुष्कर्म समेत कई अन्य धाराओं में संत कबीर नगर के परीक्षण न्यायालय ने दस जनवरी 2014 को दुष्कर्म के लिए दस वर्ष और अन्य अपराधों के लिए सात वर्ष की सजा सुनाई थी, लेकिन सजा सुनाते वक्त अदालत ने सजा के संचालन की विधि का निर्धारण नहीं किया था।
ऐसे में तय नहीं हो पा रहा था कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी या अलग-अलग। परीक्षण न्यायालय की ओर से सुनाए गए इस फैसले के खिलाफ शमशेर अली ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
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कोर्ट ने परीक्षण न्यायालय की ओर से दी गई सजा को कानून की अनदेखी माना। कहा, सजा सुनाते वक्त अदालत को सजाओं के संचालन की विधि भी स्पष्ट करनी चाहिए।
कोर्ट ने परीक्षण न्यायालय के आदेश में संशोधन करते हुए कहा, मामले में दुष्कर्म समेत अन्य धाराओं में दी गईं सजाएं एक साथ चलेंगी। ऐसा न करने पर दस वर्ष की सजा 24 वर्ष में तब्दील हो जाएगी जो अवैधानिक होगा। कोर्ट ने सजा को बरकरार रखते हुए अपील का निस्तारण किया।