फैसले के लिए गवाह की उपस्थिति और फॉरेंसिक जांच अहम
न्यायालय ने वर्ष 1993 की प्रसिद्ध फिल्म "दामिनी" के संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि 'तारीख पे तारीख' आम आदमी की धारणा बन चुकी है, लेकिन सच्चाई यह है कि एक न्यायाधीश तब तक मामले का फैसला नहीं कर सकता जब तक पुलिस अभियुक्तों और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित न करे और समय पर सही फॉरेंसिक रिपोर्ट उपलब्ध न कराई जाए।
कोर्ट ने यह भी पाया कि फॉरेंसिक लैब (एफएसएल) की स्थिति दयनीय है, जहां आधुनिक मशीनों और स्टाफ की कमी के कारण रिपोर्ट आने में लंबा समय लगता है। वर्तमान में यूपी की फॉरेंसिक लैब पुलिस विभाग का हिस्सा हैं, जिससे वे प्रशासनिक और वित्तीय रूप से स्वतंत्र नहीं हैं, इसलिए कोर्ट ने इन्हें गृह मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त विभाग बनाने का सुझाव दिया है।
न्यायालय ने डिजिटल इंडिया के दौर में आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है। अब ई-समन और ई-वारंट भेजने के लिए व्हाट्सएप, टेलीग्राम और ईमेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग अनिवार्य किया गया है। साथ ही, पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वे गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए 'स्पीच-टू-टेक्स्ट एआई' (एआई) मॉड्यूल का उपयोग करें ताकि मैन्युअल रिकॉर्डिंग में लगने वाला समय कम हो सके।
मॉनिटरिंग सेल में मौजूद रहें एसपी और कमिश्नर
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जिला पुलिस प्रमुखों और कमिश्नरों को जिला जज की अध्यक्षता वाली मॉनिटरिंग सेल की बैठकों में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति न्यायिक प्रोटोकॉल का अपमान है। अंत में, न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) प्रदान करने की व्यवहार्यता पर विचार करने का निर्देश दिया है, ताकि वे बिना किसी भय या दबाव के न्याय कर सकें। इस आदेश की एक प्रति मुख्यमंत्री के अवलोकन के लिए भी भेजने का निर्देश दिया गया है ताकि प्रशासनिक स्तर पर इन सुधारों को गति मिल सके। जहां तक मूल मामले की बात है, न्यायालय ने साक्ष्यों की गंभीरता और अपराध की प्रकृति को देखते हुए आरोपी की जमानत अर्जी को फिलहाल खारिज कर दिया है।