याची को नियमित करने का दिया आदेश
याची की नियुक्ति सिंचाई विभाग में कनिष्ठ अभियंता के रूप में एक जनवरी 1989 को की गई। वह दैनिक वेतन पर वर्षों तक कार्यरत रहा। 21 फरवरी 97 को कोर्ट ने न्यूनतम वेतन भुगतान पर सरकार को निर्णय लेने का निर्देश दिया। इसके पालन में चीफ इंजीनियर ने तीन सितंबर 97 को न्यूनतम वेतन भुगतान का आदेश दिया किंतु सेवा नियमित करने से इंकार कर दिया। जिसे सेवा अधिकरण में चुनौती दी गई।
कहा कि सेवा नियमितीकरण नियमावली लागू होने से पहले से वह कार्यरत है। नियमावली के तहत वह नियमित किए जाने का हकदार है। अधिकरण ने दावा स्वीकार कर लिया और याची को नियमित करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ याचिका पर कोर्ट ने नियमावली 2001 के तहत सरकार को विचार कर निर्णय लेने का आदेश दिया। 31 दिसंबर 18 को याची को नियमित कर दिया गया।
इसके बाद 30 सितंबर 20 को वह सेवानिवृत्त हो गया। उसकी दस साल की सेवा न पूरी होने के कारण जब पेंशन देने से इंकार कर दिया गया तो उसने याचिका दायर की। मामले में एकलपीठ ने प्रेम सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत पेंशन आदि सेवानिवृत्ति परिलाभों का भुगतान करने का निर्देश दिया। इस आदेश को अपील में चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने सेवा नियमित करने में देरी के लिए कर्मचारी दोषी नहीं
सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे अपर मुख्य अस्थायी अधिवक्ता ने कहा कि 2021 में कानून संशोधित कर दिया गया। 1961 से लागू किया गया है। जिसके तहत नियमित रूप से नियुक्ति मामले को ही सेवा अवधि में शामिल किया जाएगा। याची का पद लोक सेवा आयोग की परिधि में आने वाला पद है। क्योंकि, याची की नियुक्ति नियमानुसार खाली पद पर नहीं की गई थी, इसलिए उसकी दैनिक सेवाएं नहीं जोड़ी जाएंगी। प्रेम सिंह केस इस मामले में लागू नहीं होगा।
यह वर्क चार्ज कर्मचारियों के विषय में है। एकल पीठ ने 2020 में जारी अध्यादेश व 2021 में कानून संशोधन के उपबंधों पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने इस तर्क से सहमति व्यक्त की और कहा एकल पीठ ने गलती की है।
सेवा नियमित करने के आदेश को चुनौती दिए बगैर सेवा नियमितीकरण नियमावली का लाभ देने से इंकार करने के तर्क को सही नहीं माना जा सकता है और कहा कि सेवा नियमित करने में देरी के लिए कर्मचारी को दोषी नहीं मान सकते। नियमावली के तहत नियमितीकरण उपबंधों का लाभ देते हुए परिलाभों का भुगतान किया जाए।