मैनपुरी निवासी कमलेश सिंह ने 2008 में शिव राम मिश्रा नामक व्यक्ति के पक्ष में पंजीकृत मुख्तारनामा निष्पादित किया था। विपक्षी ने आरोप लगाया कि आवेदक को उक्त मुख्तारनामा निष्पादित करने का अधिकार नहीं था। उन्होंने धोखाधड़ी की है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल विवादों को आपराधिक रंग देने पर चिंता जताई है। कहा कि लोग सिविल विवादों में लगने वाले समय से बचने व विपक्षी को उलझाने के लिए आपराधिक प्रक्रिया का दुरुप्रयोग करते हैं। यह टिप्पणी मैनपुरी के मामले को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने की है।
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मैनपुरी निवासी कमलेश सिंह ने 2008 में शिव राम मिश्रा नामक व्यक्ति के पक्ष में पंजीकृत मुख्तारनामा निष्पादित किया था। विपक्षी ने आरोप लगाया कि आवेदक को उक्त मुख्तारनामा निष्पादित करने का अधिकार नहीं था। उन्होंने धोखाधड़ी की है। इस पर विपक्षी ने थाना कोतवाली में आवेदक पर धोखाधड़ी और जालसाजी सहित अन्य मामलों में मुकदमा दर्ज कराया। 30 अगस्त 2023 को पुलिस ने आरोप पत्र दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए आवेदक को तलब कर लिया। आवेदक ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
आवेदक के अधिवक्ता ने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने दीवानी मामले को आपराधिक मामले का जामा पहनाया गया है। इसे रद्द किया जाना चाहिए। वहीं, विपक्षी अधिवक्ता ने दलील दी कि आवेदक ने मुख्तारनामा निष्पादित किया है, जबकि वह ऐसा करने का हकदार नहीं था। कोर्ट ने कहा कि सिविल मामले को आपराधिक रंग दिए जाने पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने में संकोच नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने समन आदेश और मुकदमे की समस्त कार्यवाही निरस्त कर दिया।