इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉ.रानी द्विवेदी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने चांसलर के आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया व न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉ.रानी द्विवेदी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने चांसलर के आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया व न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने दिया है।
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विश्वविद्यालय में विज्ञापन संख्या 2/2016 के तहत असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों के लिए भर्ती निकली थी। डॉ.रानी द्विवेदी ने आवेदन किया और 25 नवंबर 2017 को साक्षात्कार में शामिल हुईं। परिणाम घोषित होने से पहले चांसलर के कार्यालय से 27 अक्तूबर 2017 को एक पत्र आया, जिसमें यूजीसी रेगुलेशन, 2010 के संशोधनों को शामिल करने के बाद ही चयन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया। इस पर कुलपति ने तीन नवंबर 2017 को भर्ती प्रक्रिया रोक दी और बाद में नया विज्ञापन जारी कर दिया। डॉ.रानी द्विवेदी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याची वकील ने दलील दी कि चांसलर का आदेश मनमाना है। सरकारी आदेश यूजीसी रेगुलेशन के संशोधनों को केवल भावी प्रभाव से लागू करता है और पहले से प्रकाशित विज्ञापनों को सुरक्षा प्रदान करता है। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि सरकारी आदेश में संशोधनों को भविष्य में लागू करने का निर्देश दिया था। कुलपति का निर्णय सरकारी आदेश का स्पष्ट उल्लंघन था। कोर्ट ने कुलपति को आदेश दिया गया है कि वे 30 दिनों के भीतर डॉ.रानी द्विवेदी को असिस्टेंट प्रोफेसर (भाषा विज्ञान) के पद पर नियुक्ति प्रदान करें।