कोर्ट ने कहा कि हर देरी पर स्वतः दंड नहीं लगाया जा सकता। दंड तभी लगाया जा सकता है जब बिना उचित कारण के देरी हो या दुर्भावनापूर्ण आचरण सिद्ध हो या लगातार लापरवाही साबित हो। कोर्ट ने पाया कि जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया था कि देरी विभागीय समस्याओं के कारण हुई, न कि किसी अधिकारी की जानबूझकर की गई गलती से। हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेशों की भाषा पर भी गंभीर टिप्पणी की। कहा कि आदेश में अधिकारी के प्रति कठोर और अपमानजनक टिप्पणियां की गई थीं।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की भाषा से पूर्वाग्रह झलकता है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। अधिकतम जुर्माना लगाना और साथ ही विभागीय कार्रवाई की सिफारिश करना, वह भी जांच रिपोर्ट आने से पहले, जल्दबाजी और मनमानी दर्शाता है।