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High Court : आरटीआई में देरी के आरोप में आईपीएस शैलेश यादव पर जुर्माने का आदेश रद्द

Sun, 01 Mar 2026 02:45 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

यह आदेश न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की एकल पीठ ने याची आईपीएस शैलेश कुमार यादव की याचिका पर दिया है। याची उस समय आईपीएस अधिकारी के रूप में गाजियाबाद में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी एवं लोक सूचना अधिकारी के पद पर प्रतिनियुक्त थे। इनके खिलाफ एक आरटीआई अर्जी में सूचना देने में देरी का आरोप लगाया गया था।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार मामले में एक आईपीएस अधिकारी पर लगाया गया 25,000 का अधिकतम जुर्माना रद्द कर दिया है। कहा कि केंद्रीय सूचना आयोग के आठ फरवरी 2007 और 19 मार्च 2007 का आदेश प्राकृतिक न्याय सिद्धांतों के विपरीत है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की एकल पीठ ने याची आईपीएस शैलेश कुमार यादव की याचिका पर दिया है। याची उस समय आईपीएस अधिकारी के रूप में गाजियाबाद में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी एवं लोक सूचना अधिकारी के पद पर प्रतिनियुक्त थे। इनके खिलाफ एक आरटीआई अर्जी में सूचना देने में देरी का आरोप लगाया गया था।

आवेदक ने 26 मार्च 2006 को पासपोर्ट से संबंधित जानकारी मांगी थी। मामला सूचना देने में लगभग 145 दिन की देरी का आरोप लगाते हुए मामला केंद्रीय सूचना आयोग पहुंचा। तत्कालीन सूचना आयुक्त ने 19 मार्च 2007 को अधिकतम 25,000 का जुर्माना लगाया और विदेश मंत्रालय को विभागीय कार्रवाई की सिफारिश भी कर दी।
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इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दलील दी कि सूचना अंततः उपलब्ध करा दी गई थी। देरी स्टाफ की भारी कमी और कार्यभार के कारण हुई। मुख्य पासपोर्ट अधिकारी की जांच रिपोर्ट में किसी भी अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया गया। आयोग ने जांच रिपोर्ट का इंतजार किए बिना जुर्माना लगा दिया। आदेशों की भाषा से पूर्वाग्रह और पक्षपात झलकता है।

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कोर्ट ने कहा कि हर देरी पर स्वतः दंड नहीं लगाया जा सकता। दंड तभी लगाया जा सकता है जब बिना उचित कारण के देरी हो या दुर्भावनापूर्ण आचरण सिद्ध हो या लगातार लापरवाही साबित हो। कोर्ट ने पाया कि जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया था कि देरी विभागीय समस्याओं के कारण हुई, न कि किसी अधिकारी की जानबूझकर की गई गलती से। हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेशों की भाषा पर भी गंभीर टिप्पणी की। कहा कि आदेश में अधिकारी के प्रति कठोर और अपमानजनक टिप्पणियां की गई थीं।

कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की भाषा से पूर्वाग्रह झलकता है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। अधिकतम जुर्माना लगाना और साथ ही विभागीय कार्रवाई की सिफारिश करना, वह भी जांच रिपोर्ट आने से पहले, जल्दबाजी और मनमानी दर्शाता है। 
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