दहेज प्रताड़ना, हत्या, आपराधिक षड़्यंत्र और साक्ष्य छिपाने के अपराध में उम्रकैद की सजा पाए एक परिवार के छह लोगों को हाईकोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। अधीनस्थ न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामले में घटनाक्रम की चेन पूरी होना आवश्यक है।
यह निर्विवाद रूप से बिना किसी संदेह के साबित होना जरूरी है कि अभियुक्तों ने ही घटना को अंजाम दिया है। अलीगढ़ की मुनीशा देवी और अन्य की आपराधिक अपील पर न्यायमूर्ति प्रीतांकर दिवाकर और न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की पीठ ने सुनवाई की। मामले के अनुसार अलीगढ़ के कहीर गांव में दो फरवरी 2012 को अनीता सिंह की हत्या कर दी गई।
उसकी लाश खैर गांव के पास नहर के किनारे पाई गई। मृतका के भाई नागेंद्र सिंह ने पति कप्तान सिंह, सत्यपाल, मुनीशा, पंकज, छोटा उर्फ पुष्पेंद्र और विनोद के खिलाफ कहीर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि अभियुक्तगणों ने दहेज में दो लाख रुपये की मांग पूरी न होने पर अनीता की हत्याकर लाश नदी किनारे फेंक दी।
वादी ने अपने बयान में बताया कि उसकी बहन की शादी कप्तान सिंह से घटना के छह साल पहले हुई थी। ससुराल वाले दो लाख रुपये की मांग कर रहे थे। इसे लेकर गांव में पंचायत भी हुई थी जिसमें अभियुक्तगणों ने दो लाख रुपये न देने पर गंभीर परिणाम की चेतावनी दी थी।
पुलिस ने जांच पूरी कर अभियुक्तगणों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी, जिस पर अपर सेशन जज ने उम्रकैद और अन्य धाराओं में कैद के साथ जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दाखिल अपील में कहा गया कि अभियुक्तगण निर्दोष हैं, उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है।
एकमात्र अंतिम बार साथ देखे जाने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि हत्या उन्हीं लोगों ने की है। अभियोजन का कहना था कि अनीता अपने चचेरे भाई की शादी में दिल्ली जाने के लिए घर से निकली थी। खुद उसके पति कप्तान ने उसके मायके वालों को बताया था कि वह और परिवार के अन्य सदस्य भी शादी में दिल्ली आ रहे हैं।
मगर कोई दिल्ली नहीं पहुंचा। अनीता की मौत कैसे हुई यह साबित करने का भार अभियुक्तगणों पर है। कोर्ट ने कहा कि पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, जिसमें घटनाक्रम की चेन साबित होना जरूरी नहीं है। ऐसा नहीं होने पर अभियुक्तगण संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं।