वहीं, राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि जिन पदों पर नियुक्तियां की गईं, उनके सृजन संबंधी अभिलेख संदिग्ध हैं। कई आदेश विभागीय डिस्पैच रजिस्टर में दर्ज नहीं मिले और कुछ दस्तावेज प्रथम दृष्टया फर्जी प्रतीत हुए। सरकार का यह भी कहना था कि नियुक्तियों में निर्धारित प्रक्रिया और योग्यता संबंधी नियमों का पालन नहीं किया गया।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा यदि पद वर्ष 1980 या 1988 में सृजित हुए थे, तो कानून के अनुसार तीन महीने के भीतर नियुक्तियां हो जानी चाहिए थीं, जबकि नियुक्तियां वर्ष 1996 में की गईं। इस प्रकार नियुक्तियां उत्तर प्रदेश जूनियर हाईस्कूल वेतन भुगतान अधिनियम, 1978 के तहत विपरीत पाई गईं।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता अगस्त 2000 के बाद वास्तव में कार्यरत रहे या नहीं, इसका कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। इसलिए केवल अंतरिम आदेश के आधार पर वेतन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। अंत में कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि कानून के विरुद्ध की गई नियुक्तियों को केवल सहानुभूति या लंबे समय तक सेवा देने के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता।