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UP : हाईकोर्ट ने मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली पर की गंभीर टिप्पणी, यह है पूरा मामला

Wed, 29 Apr 2026 03:14 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि मानवाधिकार आयोग ने उन मामलों में स्वतः संज्ञान नहीं लिया, जहां मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले और लिंचिंग की घटनाएं हुईं।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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लाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि मानवाधिकार आयोग ने उन मामलों में स्वतः संज्ञान नहीं लिया, जहां मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले और लिंचिंग की घटनाएं हुईं, बल्कि ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करता दिख रहा है जो प्रथम दृष्टया उसके कार्यक्षेत्र में नहीं आते। अदालत ने उत्तर प्रदेश के 588 मदरसों से जुड़ी शिकायत में जांच के आदेश को प्रथम दृष्टया अवैध बताते हुए आयोग को नोटिस जारी किया है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की एकलपीठ ने की। अदालत ने कहा कि आयोग ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है, जो उसके कानूनी अधिकार क्षेत्र के बाहर है।

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मानवाधिकार आयोग पर प्रतिकूल टिप्पणियों को लेकर जजों के बीच मतभेद


इलाहाबाद हाईकोर्ट में टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया द्वारा दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान पीठ के दो न्यायाधीशों के बीच वैचारिक मतभेद का एक दुर्लभ मामला सामने आया है। न्यायमूर्ति विवेक सरन ने इस मामले में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन द्वारा पारित आदेश के कुछ विशिष्ट अंशों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के विरुद्ध की गई प्रतिकूल टिप्पणियों पर अपनी स्पष्ट असहमति व्यक्त की है।

यह विवाद 27 अप्रैल, 2026 को हुई सुनवाई के दौरान तब उपजा जब याचिकाकर्ता के वकील ने मामले को स्थगित करने का अनुरोध किया था। न्यायमूर्ति विवेक सरन के अनुसार, उस समय न तो याचिकाकर्ता पक्ष बहस के लिए तैयार था और न ही एनएचआरसी का कोई प्रतिनिधि अदालत में मौजूद था। ऐसी स्थिति में, न्यायमूर्ति सरन का मानना है कि किसी भी पक्ष की अनुपस्थिति में मामले के गुण-दोष या किसी संवैधानिक संस्था की भूमिका पर टिप्पणी करना उचित नहीं था।
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न्यायमूर्ति सरन ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि हालांकि रिट कोर्ट को पक्षों की अनुपस्थिति में आदेश पारित करने का कानूनी अधिकार है, लेकिन इस मामले में की गई गंभीर टिप्पणियों के लिए सभी संबंधित पक्षों को सुना जाना अनिवार्य था। उन्होंने न्यायमूर्ति श्रीधरन द्वारा निर्देशित आदेश के पैराग्राफ 6 और 7 में उल्लिखित तथ्यों और निष्कर्षों से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है। अंततः, न्यायमूर्ति सरन केवल सुनवाई स्थगित करने के प्रशासनिक निर्णय पर सहमत हुए, जबकि मामले की मेरिट और एनएचआरसी से जुड़ी टिप्पणियों पर अपनी असहमति दर्ज कराई।
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