इस फैसले का विरोध करते हुए याची जीरा देवी व अन्य ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दलील दी कि इस फैसले से उनका हित प्रभावित हो रहा है। मुकदमा वापस लेने का अधिकार वादी को है या नहीं, इसके निर्धारण के लिए जेजे मुनीर की एकल पीठ ने मामले को पूर्ण पीठ को भेज दिया।
अनुराग मित्तल, रायसा सुल्ताना बेगम और अनुराग मित्तल मामले की दी गईं दलीलें...
पूर्ण पीठ में सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ब्रिज राज ने दलील दी कि बिना प्रभावित पक्ष को सुने मुकदमे को वापस लेने के आवेदन को स्वीकार नहीं किया जा सकता। कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अनुराग मित्तल के मामले में दिया गया फैसला दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) पर लागू नहीं होगा। वहीं, प्रतिवादी के अधिवक्ता ने रायसा सुल्ताना बेगम मामले का हवाला देते हुए दलील दी कि मुकदमा वापसी का आवदेन देते ही वह स्वत: समाप्त हो जाता है।
इस पर पूर्ण पीठ ने कहा कि रायसा सुल्ताना बेगम मामले में दिए गए फैसले में कहा गया था कि मुकदमा वापसी के लिए आवेदन देते ही मुकदमा स्वतः समाप्त हो जाता है, जिसे अब सर्वोच्च न्यायालय के ‘राजेंद्र प्रसाद गुप्ता’ मामले के आलोक में गलत ठहराया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का ‘अनुराग मित्तल’ (2018) फैसला हिंदू विवाह अधिनियम पर आधारित था। वह सीपीसी पर लागू नहीं होता। इसी के साथ पूर्ण पीठ ने मामले के अंतिम निपटारे के लिए उसे नियमित पीठ के पास वापस भेज दिया।