न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने टिप्पणी की
आवेदक के वकील ने न केवल खुली अदालत में आदेश पारित होने के बाद भी मामले पर बहस जारी रखी, बल्कि कार्यवाही में व्यवधान भी डाला। इस व्यवहार को न्यायालय की आपराधिक अवमानना माना जाता है। क्योंकि, यह न्यायिक प्रक्रिया के अधिकार और शिष्टाचार को कमजोर करता है।