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High Court : समान साक्ष्य पर सास-ससुर बरी तो पति को सजा क्यों, हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

Wed, 13 May 2026 08:45 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिस समान साक्ष्य के आधार पर याची के माता-पिता को दोषमुक्त किया गया, उसी के आधार पर सिर्फ याची को सजा देना न्यायसंगत नहीं है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिस समान साक्ष्य के आधार पर याची के माता-पिता को दोषमुक्त किया गया, उसी के आधार पर सिर्फ याची को सजा देना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया जब तक अभियोजन पक्ष ठोस साक्ष्य प्रस्तुत न करे आरोपी को सिर्फ पति होने के नाते दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

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इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने रामपुर जिले के एक मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया है। कोर्ट ने पत्नी की हत्या के मामले में पति महिपाल को बरी कर दिया और उसकी आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा-प्रथम की खंडपीठ ने दिया है।रामपुर की सत्र अदालत ने अप्रैल 2023 को महिपाल को अपनी पत्नी ममता की हत्या का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, इसी मामले में साक्ष्यों के अभाव में आरोपी सास-ससुर को पहले ही बरी कर दिया था। याची पति ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि घटना के समय पति घर में मौजूद था या नहीं। महिपाल पेशे से ड्राइवर था और अक्सर काम के सिलसिले में बाहर रहता था। इसलिए, साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का बोझ सीधे उस पर नहीं डाला जा सकता। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पति-पत्नी का एक ही छत के नीचे रहना मात्र उन्हें अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास पाया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी अभियोजन के दावे के विपरीत होने के चलते याची महिपाल को बरी कर दिया गया।

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