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High Court : वैवाहिक विवाद में समझौता हो गया तो मुकदमा जारी रखने का औचित्य नहीं

Sat, 09 May 2026 11:27 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक या पारिवारिक विवादों में पक्षकारों ने आपसी समझौता कर लिया हो, तो आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का औचित्य नहीं रह जाता।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक या पारिवारिक विवादों में पक्षकारों ने आपसी समझौता कर लिया हो, तो आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का औचित्य नहीं रह जाता। ऐसे मामलों में समझौते के बाद मुकदमे को जारी रखना अभियुक्तों का उत्पीड़न होगा और न्यायालय का कीमती समय बर्बाद होगा। न्यायमूर्ति नंद प्रभा शुक्ला की एकल पीठ ने नितेश शर्मा व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। इसी के साथ कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट में लंबित मुकदमे की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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फर्रुखाबाद के महिला थाना में याचियों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न, मारपीट, छेड़छाड़, जान से मारने की धमकी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा में एफआईआर दर्ज है। याचियों ने मुकदमे की कार्यवाही रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याची के अधिवक्ता दिव्यांशु तिवारी ने दलील दी कि यह विवाद विशुद्ध रूप से पति-पत्नी के बीच कलह के कारण उत्पन्न हुआ था। दोनों पक्षों ने 23 अगस्त 2024 को लिखित समझौता कर लिया है, जिसे ट्रायल कोर्ट ने 2 अप्रैल 2025 को सत्यापित भी कर दिया है।

कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय की ओर से बीएस जोशी बनाम हरियाणा राज्य और ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य मामलों में दिए गए फैसलों का संदर्भ लिया। कोर्ट ने माना कि जिन आपराधिक मामलों में मुख्य आधार व्यक्तिगत या निजी विवाद होते हैं और पक्षकारों ने अपनी संतुष्टि के साथ समझौता कर लिया है, वहां दोषसिद्धि की संभावना बेहद कम और क्षीण हो जाती है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि पक्षकार अब मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते और स्वेच्छा से विवाद सुलझा चुके हैं, इसलिए ऐसे गैर-शमनीय अपराधों में भी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए कार्यवाही रद्द की जा सकती है।

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