इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में पुलिस अभिरक्षा में हुई मौत के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से वीडियो व साक्ष्य मांगे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि अगली सुनवाई तक यह महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, तो मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी जा सकती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में पुलिस अभिरक्षा में हुई मौत के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से वीडियो व साक्ष्य मांगे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि अगली सुनवाई तक यह महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, तो मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी जा सकती है। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स लखनऊ की जनहित याचिका पर दिया है।
विज्ञापन
मैनपुरी के दन्नाहार थाने में वर्ष 2009 में नाहर सिंह की मौत हुई थी। पुलिस का दावा था कि नाहर सिंह ने प्रेम प्रसंग में विफलता के कारण थाने के शौचालय में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली थी। इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने वर्ष 2011 में ही अपनी कार्यवाही बंद कर दी थी, जिसमें पुलिस को लापरवाही का दोषी नहीं माना गया था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि मानवाधिकार आयोग के आदेश में उन दस्तावेजों या वीडियो साक्ष्यों का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, जिन्हें आधार बनाकर मामला बंद किया गया था।
विज्ञापन
राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि घटना के वीडियो और फोटोग्राफ मानवाधिकार आयोग को भेज दिए गए थे, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इन दस्तावेजों की कोई विस्तृत सूची या रसीद उपलब्ध नहीं है। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए कहा कि साक्ष्यों की सुरक्षा की कड़ी का टूट जाना एक रहस्य बना हुआ है।
न्यायालय ने अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि वे इस मामले से संबंधित सभी वीडियो, फोटोग्राफ और अन्य दस्तावेज तत्काल राज्य सरकार के अधिकृत व्यक्ति को वापस करें। साथ ही, तत्कालीन एसडीएम कर्मेंद्र सिंह और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक मैनपुरी को भी व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई पांच मई 2026 को होगी।