गोरखपुर में घटना, लखनऊ से गिरफ्तारी
मामला गोरखपुर जिले का है। याची को सुनील कुमार गुप्ता को 2017 में गोरखपुर पुलिस ने छेड़छाड़ और दुष्कर्म के प्रयास जैसे गंभीर आरोप में लखनऊ से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के वक्त पुलिस ने न तो यह देखा कि आरोपी उस दिन शहर में था या नहीं और न ही मेडिकल रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि हुई। 79 दिन जेल में बिताने के बाद याची ने अपनी बेगुनाही के सबूत पेश किए। साबित किया कि कथित घटना के दिन वह गोरखपुर में मौजूद ही नहीं था। आंतरिक पुलिस जांच में भी दरोगा को लापरवाही का दोषी पाया गया था।
पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी की शक्ति मिलने मात्र से यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह रूटीन तरीके से किसी को भी गिरफ्तार कर ले। - हाईकोर्ट हाईकोर्ट
कोर्ट ने कहा-सजा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है
कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे कई मामलों का साक्षी रहा है, जहां अपराध के तुरंत बाद संपत्तियों को निशाना बनाकर औपचारिकताएं पूरी कर ध्वस्तीकरण कर दिया जाता है। निर्माण को तोड़ने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2025 में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या ध्वस्तीकरण शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन नहीं है। क्योंकि, सजा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है। कोर्ट ने चार प्रमुख कानूनी सवाल तय करते हुए पक्षों से नौ फरवरी को जवाब मांगा है। अंतरिम आदेश में पुलिस को याचिकाकर्ताओं के जीवन, अंग और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
कोर्ट के सवाल
क्या सुप्रीम कोर्ट के 2025 के आदेश का पालन हो रहा है?
क्या अपराध के तुरंत बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करना सरकार के विवेक का दुरुपयोग नहीं है?
क्या राज्य का यह कर्तव्य नहीं है कि वह सार्वजनिक आवश्यकता के अभाव में किसी का घर न गिराए?
ध्वस्तीकरण की आशंका होने पर क्या कोई नागरिक अदालत जा सकता है?