अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि ‘अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम 1860’ की धारा-6 किसी भी वर्ग के व्यक्ति को अदालत जाने से नहीं रोकती, बल्कि यह विभिन्न श्रेणियों के अभिभावकों को मान्यता देने का काम करती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिभावक शब्द की परिभाषा काफी व्यापक है। इसमें बच्चे की हिरासत का अधिकार भी शामिल है। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट 1984 की धारा-7 के तहत परिवार न्यायालय को नाबालिगों की संरक्षकता और हिरासत से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका एक संक्षिप्त प्रक्रिया है, जिसमें साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन और बच्चों के कल्याण की गहन जांच संभव नहीं है। अंत में अदालत ने याचिका को निस्तारित करते हुए याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह उचित राहत के लिए सक्षम परिवार न्यायालय के समक्ष अपनी बात रखे।