कोर्ट ने जमानत अर्जियों पर प्रभावी रूप से पैरवी नहीं कर पाने वाले कैदियों को भी चिह्नित करने को कहा है। यह भी निर्देश दिया कि जो अधिवक्ता ऐसे कैदियों को कानूनी सहायता मुहैया कराते हैं, उनकी मदद की जाए ताकि वह जरूरी दस्तावेज प्राप्त कर सकें। कोर्ट ने जेल अधिकारियों को भी निर्देश दिया है कि वे विधिक सेवा प्राधिकरण का सहयोग करें।
मामले में याची की ओर से तर्क दिया गया कि 2019 में उसकी जमानत अर्जी ट्रायल कोर्ट की ओर से खारिज की जा चुकी है। याची एक गरीब व्यक्ति है, जिसे उसके नजदीकियों और रिश्तेदारों ने भी जेल जाने के बाद छोड़ दिया। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने में उसे तीन साल लग गए।