कोर्ट ने कहा कि आरोपी के लोक सेवक होने के नाते शासन से उनके खिलाफ अभियोग चलाने की मांगी गई अनुमति पर इंकार कर दिया गया। जिसकी वैधता पर हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे, जहां आदेश पर हस्तक्षेप नहीं किया गया। निष्पक्ष विवेचना पर उठे सवालों को हाईकोर्ट ने सही नहीं माना और विवेचना अन्य एजेंसी को सौंपने की मांग अस्वीकार कर याचिका खारिज कर दी। ऐसे में ट्रायल कोर्ट को प्रोटेस्ट अर्जी पर इन्हीं मुद्दों को फिर से सुनने का अधिकार नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने प्रोटेस्ट अर्जी खारिज करने में कोई कानूनी प्रक्रियागत गलती नहीं की है। अर्जी खारिज करने की वैधता की चुनौती याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा पुनरीक्षण याचिका पर आदेश के पूर्व याची की कानूनी संघर्ष यात्रा को देखना जरूरी है।
गोरखपुर के कैंट थाने में दर्ज हुई थी प्राथमिकी
कोर्ट ने कहा याची अक्तूबर 2007 में योगी आदित्यनाथ तत्कालीन सांसद गोरखपुर के खिलाफ हाईकोर्ट आया कि हुए अपराध की प्राथमिकी दर्ज की जाए। कोर्ट ने कहा अधीनस्थ अदालत में धारा 156(3) में एफआईआर दर्ज करने की अर्जी दी। सीजेएम ने अर्जी खारिज कर दी। याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने सीजेएम का आदेश रद्द करते हुए प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना का निर्देश दिया। 2 नवंबर 2008 को गोरखपुर के कैंट थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई।
योगी सहित पांच लोग आरोपित किए गए। योगी इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए किंतु राहत नहीं मिली। इसके बाद याची ने सही विवेचना के लिए अन्य एजेंसी को जांच सौंपने की मांग में हाईकोर्ट में याचिका दायर की। आरोप लगाया कि योगी के भाषण की डीवीडी व कंपैक्ट डिस्क की फारेंसिक जांच सही नहीं कराई गई, जो उसने कोर्ट में पेश की थी। उसकी जांच न कराकर फर्जी डीवीडी व कंपैक्ट डिस्क जांच के लिए लैब भेजा गया। इसी दौरान शासन ने योगी के खिलाफ अभियोग चलाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया। सीबीसीआईडी ने फाइनल रिपोर्ट पेश की।
अपर महाधिवक्ता ने याची की संलिप्तता पर खड़े किए सवाल
कोर्ट में अभियोग चलाने के कानूनी मुद्दों पर सरकार से पक्ष रखने को कहा विवेचना फेयर नहीं तो कोर्ट विवेचना स्थानांतरित कर सकती है। अंतत: कोर्ट ने जांच प्रक्रिया सही मानी और याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप नहीं किया।
इसके बाद प्रोटेस्ट अर्जी में अभियोग चलाने से इंकार आदेश पर सवाल खड़े किए गए। विशेष अदालत ने अर्जी खारिज कर दी। कहा अभियोग चलाने के राज्य शासन के इंकार के मुद्दे पर वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सुनवाई नहीं कर सकती, जिसे चुनौती दी गई थी।
अपर महाधिवक्ता ने याची की संलिप्तता पर सवाल खड़े किए। कहा उस पर गंभीर अपराध के केस हैं। सोशल वर्कर नहीं कह सकते। कुछ ताकतें हैं जो मुख्यमंत्री योगी और प्रदेश का उनके द्वारा किया जा रहा विकास नहीं देखना चाहतीं। याची को ऐसी ताकतों का संरक्षण है। ताकतें प्रदेश की प्रगति को डिरेल करना चाहती है। याची ऐसी ताकतों का मुखौटा है। जिस पर कोर्ट ने राज्य पर इसकी जांच छोड़ते हुए विशेष अदालत के आदेश पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।