इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) भर्ती में लागू आरक्षण व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता संविधान संशोधन और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों के आलोक में संबंधित प्रावधानों को असंवैधानिक साबित करने में सफल नहीं हुए, इसलिए अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) भर्ती में लागू आरक्षण व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता संविधान संशोधन और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों के आलोक में संबंधित प्रावधानों को असंवैधानिक साबित करने में सफल नहीं हुए, इसलिए अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी।
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प्रयागराज निवासी याची अश्वनी तिवारी और अन्य ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण) अधिनियम, 1994 की धारा 3(2) बैकलॉग, 3(5)रोस्टर प्रणाली और 3(6) मेरिट पर चयनित आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी और ईडब्ल्यूएस आरक्षण अधिनियम, 2020 की धारा 3(6) तथा वर्ष 1999 के दो शासनादेशों को चुनौती दी थी। याची का कहना था कि एपीओ भर्ती की 182 रिक्तियों में सामान्य वर्ग के लिए केवल 27 पद रखे गए हैं। इससे आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक हो गया है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि सेवा अधिनियम 1994 अधिनियम की धारा 3(2) संविधान के 81वें संशोधन के बाद जोड़े गए अनुच्छेद 16(4-बी) के अनुरूप है। साथ ही धारा 3(5) को सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट ऑफ यूपी बनाम संगम नाथ पांडे मामले में भी स्वीकार किया है। आयोग की ओर से भी राज्य के तर्कों का समर्थन किया गया।
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कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि राज्य ने स्पष्ट रूप से दिखाया है कि संविधान संशोधन और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के बाद याचियों की चुनौती टिक नहीं सकती। इसलिए अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए आरक्षण संबंधी प्रावधानों में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया।