यह था मामला
कर्मचारी ने 1977 में चतुर्थ श्रेणी के पद पर सेवा शुरू की थी। पदोन्नति के बाद वह उन्नाव के पुरवा स्थित सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत में डिप्टी नाजिर के रूप में कार्यरत था। उसके खिलाफ 1997 में चार आरोपपत्र जारी किए गए। आरोप था कि याची ने 23 नवंबर 1994 को रात करीब नौ बजे तत्कालीन मुंसिफ मजिस्ट्रेट के आवास के पास नशे की हालत में एक होमगार्ड के साथ दुर्व्यवहार किया था। गश्त कर रही पुलिस ने उसे पकड़कर रातभर हिरासत में रखा।
जांच अधिकारी ने होमगार्ड से दुर्व्यवहार से संबंधित पहले आरोप को साबित नहीं माना। बाकी तीन आरोपों को सही पाया। इसके बाद जिला जज ने 21 दिसंबर 1998 को याची को बर्खास्त कर दिया। एक दिसंबर 1999 को उसकी विभागीय अपील खारिज की। इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका लंबित रहने के दौरान अप्रैल 2006 को उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को मामले में पक्षकार बनाया गया।
विभागीय जांच में नहीं मिली खामी
याची के अधिवक्ता ने दलील कि विभागीय जांच ऐसे दस्तावेज पर आधारित थी, जिन्हें विधिवत साबित नहीं किया गया। कथित तौर पर उसकी चिकित्सकीय जांच करने वाले डॉक्टर और पुलिस रिकॉर्ड तैयार करने वाले अधिकारी को भी गवाही के लिए पेश नहीं किया गया। यह भी तर्क दिया गया कि जब पहला आरोप साबित नहीं हुआ तो शेष आरोपों को स्वतंत्र रूप से बरकरार नहीं रखा जा सकता।
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने दलील दी कि रिट कोर्ट विभागीय अपील प्राधिकारी की तरह दोबारा साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकता। कोर्ट ने विभागीय जांच में कोई खामी नहीं पाई। कहा कि जांच के दौरान छह गवाहों के बयान दर्ज किए गए। याची को जिरह करने का अवसर मिला। जिन अनुपस्थित रहने वाले दो अधिकारी प्रासंगिक गवाह थे, लेकिन उनकी अनुपस्थिति मात्र से पूरी जांच अवैध नहीं हो जाती।
तीन महीने में भुगतान का आदेश
कोर्ट ने विभागीय जांच में हस्तक्षेप से इन्कार कर अनुकंपा नियुक्ति की मांग भी खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने उसकी पत्नी को सात अप्रैल 2006 से पारिवारिक पेंशन और उसकी पूरी बकाया राशि का हकदार माना। कोर्ट ने आदेश दिया कि बकाया पेंशन में 25 प्रतिशत बकाया वेतन तक सीमित राहत के कारण कोई कटौती नहीं की जाएगी। सेवा की काल्पनिक निरंतरता के आधार पर अन्य सभी सेवानिवृत्ति और मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ भी तीन महीने में जारी करना होगा।