कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 233 जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है और इसके उपखंड (2) में कहा गया है कि एक व्यक्ति, जो पहले से ही संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, वही केवल नियुक्ति के लिए पात्र होगा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 233 (2) के अनुसार न्यायिक अधिकारी अथवा जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति पाने के लिए एक वकील को कम से कम सात वर्षों तक निरंतर वकालत के अभ्यास में रहना होगा।
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कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 233 जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है और इसके उपखंड (2) में कहा गया है कि एक व्यक्ति, जो पहले से ही संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, वही केवल नियुक्ति के लिए पात्र होगा।
मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति डॉ. कौशल जयेंद्र ठाकर और न्यायमूर्ति अजय त्यागी की खंडपीठ ने दीपक अग्रवाल बनाम केशव कौशिक और अन्य के मामले में शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला दिया। इसमें यह माना गया था कि अनुच्छेद 233 (2) के तहत जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति चाहने वाले व्यक्ति को आवेदन की तिथि पर लगातार सात वर्षों तक (बिना किसी विराम के) अधिवक्ता के रूप में अभ्यास करना चाहिए।
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याचिका पर सुनवाई कर रही खंडपीठ के समक्ष हाईकोर्ट प्रशासन के फैसले को चुनौती दी गई थी। याची ने हायर ज्यूडिशियरी प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली थी। लेकिन उसे मुख्य परीक्षा में इसलिए नहीं शामिल किया गया कि वह सात साल से प्रैक्टिस में नहीं थे। याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मुख्य परीक्षा में शामिल होने के लिए निर्देश देने की मांग की थी। लेकिन कोर्ट ने याची के तर्कों को स्वीकार नहीं किया।