2009 से अलग रह रहे थे दंपती
दलील दी थी कि बीते छह वर्ष (2009 से ) से वैचारिक मतभेद के कारण पत्नी अलग रह रही है, लेकिन पारिवारिक न्यायालय ने उनके पक्ष में तलाक की डिक्री पारित करने से इन्कार कर दिया था। पारिवारिक न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट डॉक्टर ने वर्ष 2019 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अपीलार्थी के अधिवक्ता का कहना था कि पत्नी लगभग 15 वर्ष से अलग रह रही है। उनके बीच वैवाहिक रिश्ते को लेकर अब किसी भी तरह का भावनात्मक लगाव नहीं रह गया है।
विवाह विच्छेद कानून में बदलाव की जरूरत
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2006 में नवीन कोहली के मामले का जिक्र करते हुए कहा, पति-पत्नी के बीच लंबी जुदाई भावनात्मक रिश्ते को मृतप्राय कर देती है। इसलिए पक्षकारों पर जबरदस्ती ऐसे रिश्ते का बोझ थोपना उनके विरुद्ध मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
कोर्ट ने कहा, अब दौर बदल चुका है, रिश्ते में भावनाओं और सम्मान की जगह पाश्चात्य संस्कृति ने ले ली है। ऐसे में पहले से मौजूद विवाह विच्छेद कानून में तलाक के आधारों में संशोधन की भी जरूरत है। कोर्ट ने आश्चर्य भी जताया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से नवीन कोहली मामले में स्थापित विधि व्यवस्था के बावजूद सरकार कानून में संशोधन पर विचार नहीं कर रही।
कानून संशोधन पर विचार करे केंद्र सरकार
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री के इस आदेश की प्रति केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय और विधि आयोग को भेजने का निर्देश दिया है, जिससे सरकार विवाह विच्छेद के आधारों में संशोधन पर विचार करे और तलाक के आधारों में यह भी जोड़े कि पति-पत्नी के अलग रहने की लंबी अवधि भी मानसिक क्रूरता है। इस आधार पर भी पीड़ित पक्षकार तलाक का हकदार हो और लंबे समय तक बोझिल रिश्ते को ढोने के लिए बाध्य न हो।