उन्होंने विपक्षी अन्य भाई-बहनों की ओर से बाहरी व्यक्तियों को बेची गई जमीन के विक्रय विलेख को अवैध बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने पाया कि जब मोहम्मद इलियास की वसीयत 2016 में तैयार हुई, जबकि उनके घनिष्ठ मित्र मोहम्मद अनस की मृत्यु 2015 में हो चुकी थी। वसीयत में उन्हें जीवित और संपत्ति का आधा स्वामी दिखाया गया। यह विरोधाभास वसीयत को फर्जी साबित करने के लिए पर्याप्त था।
साथ ही यह भी पाया कि वसीयतकर्ता उन संपत्तियों (कोल्ड स्टोरेज, टेक्सटाइल्स) के अकेले मालिक नहीं थे, बल्कि उनमें कई अन्य साझेदार भी थे। ऐसे में वे पूरी संपत्ति की वसीयत नहीं कर सकते थे।इसके अलावा वादियों ने अपनी बहनों और मां को मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया था, जिसे कोर्ट ने गंभीर कानूनी चूक माना। लिहाजा, कोर्ट ने वसीयत को संदिग्ध मान अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मुस्लिम कानून के तहत वसीयत केवल एक तिहाई हिस्से तक सीमित है। वारिस के पक्ष में वसीयत होने पर अन्य वारिसों की मौन सहमति पर्याप्त नहीं है, उनकी स्पष्ट मंजूरी अनिवार्य है।