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मार्केटिंग से बेस्ट सेलर बन रहीं किताबें

Sat, 23 Apr 2016 02:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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‌किताबें - फोटो : demo pic
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‘अगर बातें करो तो बोलती हैं, किताबें आदमी को खोलती हैं’ मशहूर शायर महेश अश्क की ये पंक्तियां किताबों से आदमी के रिश्तों को बखूबी बयां करती हैं। इन्हें पढ़ते हुए हम शब्द दर शब्द उन घटनाक्रमों से गुजरते हुए उन पर मनन, मंथन करते हैं। कई बार अच्छी किताबें सोच और जीवन की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाती हैं लेकिन इंटरनेट के मौजूदा दौर में किताबों के प्रति रुझान में तेजी से कमी आई है। ज्यादातर या समानांतर व्यवस्था में किताबें या अन्य पठनीय सामग्री आनलाइन है। बड़ों क्या बच्चों की भी किताबों से कुट्टी हो गई है। ऐसे वक्त में किताबों के बेस्ट सेलर बनने का मानक भी बदला है।
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दरअसल, किताबों के बेस्ट सेलर बनने के पीछे का खेल भी शुद्ध रूप से मार्केटिंग का है। यानी किताब अगर औसत दर्जे के लेखक और सामान्य विषय पर भी है लेकिन उसके लिए बेहतर मार्केटिंग होती है तो वह किताब बेस्ट सेलर की दौड़ में आगे निकल जाती है। कपड़े, साबुन समेत दूसरे सामानों के विज्ञापनों की तरह किताबों का विज्ञापन किया जा रहा है। प्रकाशकों की ओर से किताबों का आनलाइन, आफलाइन प्रचार करके सीधे तौर पर पाठकों के दिलोदिमाग पर एक औसत दर्जे के लेखक और सामान्य विषय की किताबों को थोपा जा रहा है। आमतौर पर यह भी देखा जा रहा है कि बेस्ट सेलर बनने वाली ज्यादातर किताबें ज्ञानवर्द्धक या समाज को दिशा देने वाली नहीं फिक्शन या प्रेम कहानियों पर आधारित ही हैं।
राजकमल प्रकाशन समूह के निदेशक अमोद माहेश्वरी कहते हैं, बीते कई वर्षों में ही किताबों के लिए बेस्ट सेलर का चलन बढ़ा है। अंग्रेजी भाषा में एक वर्ष में दस हजार से अधिक और हिंदी में पांच हजार से अधिक किताबों की बिक्री होने पर उस पुस्तक को बेस्ट सेलर की श्रेणी में रखा जाता है। आज किताबों पर मार्केटिंग का फंडा हावी है। जिस किताब की जितनी अच्छी मार्केटिंग होती है, वह पाठकों के बीच उतनी ही अच्छी जगह बनाती है। अक्सर ऐसा होता है कि लेखक और प्रकाशक बेस्ट सेलर की रेस में खुद को शामिल करने के लिए किताबों का  अनुवाद भी करवाते हैं ताकि एक भाषा में न सही तो दूसरी भाषा में ही किताब बेस्ट सेलर बन जाए।
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राष्ट्रीय पुस्तक मेले के आयोजक और केटी फाउंडेशन के संयोजक देवराज अरोड़ा भी कहते हैं, आज तो मार्केटिंग का फंडा हावी है। अच्छी मार्केटिंग होती है तो सामान्य लेखक की किताबें भी बेस्ट सेलर बन जाती है और मार्केटिंग अच्छी न हो तो अच्छे लेखक और अच्छे विषयों पर लिखी गईं किताबें भी पीछे रह जाती हैं। कई बार एक अच्छी किताब भी पाठकों तक पहुंचने में असफल हो जाती है। मौजूदा दौर में ज्वलंत मुद्दों और कोरी कल्पनाओं को विषय बनाकर लिखी गई किताबें ज्यादा आ रही हैं। अच्छी साहित्यिक किताबों के प्रकाशन में कमी आई है। वरिष्ठ कवि यश मालवीय मानते हैं कि किताबों की दुनिया भी बाजारवाद से अछूती नहीं है। उनकी बिक्री और बेस्ट सेलर बनने का मामला कुछ ऐसा ही है।
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