आठ जून से हाईकोर्ट में प्रतिबंधों के साथ खुली अदालत में मुकदमों की सुनवाई की व्यवस्था को लेकर कई अधिवक्ताओं ने पुनर्विचार की मांग की है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कांस्टीट्यूशन एंड सोशल रिफार्म के अध्यक्ष अमर नाथ त्रिपाठी ने कहा है कि 65 वर्ष से अधिक आयु के अधिवक्ताओं को हाईकोर्ट परिसर में प्रवेश की अनुमति न देना अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)जी एवं,अनुच्छेद 21 के मूल अधिकारों के विपरीत है।
ऐसा करना आयु के आधार पर वकीलों के बीच भेदभाव करना है। केन्द्र सरकार की गाइड लाइन के पैरा सात में स्वास्थ्य एवं आवश्यक सेवाओं को छूट दी गई है। वादकारी को न्याय आवश्यक सेवाओं में शामिल है जिसे आयु के आधार पर नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। जिस वादकारी के लिए न्याय व्यवस्था है, उसे और उसके प्रतिनिधि को कोर्ट में जाने से रोकना उचित नहीं है।
सोशल रिफार्म के अध्यक्ष अमरनाथ त्रिपाठी ने मुख्य न्यायाधीश से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है । अधिवक्ता शरदचंद्र मिश्र ने भी स्वास्थ्य की जांच कर 65 वर्ष से अधिक उम्र के वकीलों को भी मुकदमे में बहस करने की अनुमति देने की मांग की है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 जून से खुली अदालत में सुनवाई की व्यवस्था की है जिसमें 65वर्ष की आयु से अधिक के वकीलों को कोर्ट परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी है। उन्हें वीडियो कांफ्रेंसिंग से बहस की सुविधा दी गयी है। अन्य आयु के वकीलों को कोर्ट में आकर बहस करने अथवा वीडियो कांफ्रेसिंग से बहस की अनुमति दी गई है।