सबको गोरे रंग की चाहत
बॉडी शेमिंग से परेशान अधिकर लड़कियां ब्यूटी पॉर्लर में गोरा दिखने की चाहत लेकर जाती हैं। जया ब्राइडल स्टूडियो की राजश्री सिन्हा बताती हैं कि महीने में तकरीनब 20-25 लड़कियां ऐसी आती हैं, जो अपने सांवले रंग से परेशान होती हैं। किसी पर घरवालों का दबाव होता है तो किसी पर शादी करने का। वह आकर यही कहती हैं कि मैम मुझे गोरा और बहुत गोरा दिखना है। जबकि उन्हें समझाया जाता है कि आपका रंग बहुत खूबसूरत है, उससे प्यार करिए।
लड़के वालों को पसंद आ जाऊं, इसलिए वजन कम करना है
अपनी खुशी से फिट रहना अलग बात है और दबाव में आकर वजन कम करना अलग बात। सिविल लाइंस स्थित ग्लोबल जिम की संचालिका अर्चना अग्रवाल कहती हैं कि महीने में कम से कम 10 लड़कियां तो ऐसी आती ही हैं, जो घरवालों के दबाव में वजन कम करना चाहती हैं। यह लड़कियां कहती हैं कि लड़के वालों को पसंद आ जाऊं, इसलिए वजन कम करना है। कुछ के तो अभिभावक भी साथ में आते हैं और कहते हैं कि मेरी बेटी का वजन कम कर दीजिए। अधिक वजन होने की वजह से कई रिश्ते रिजेक्ट हो चुके हैं।
तानों से टूटा मन
नैदानिक मनोवैज्ञानिक मालविका राव बताती है कि बॉडी शेमिंग का शिकार लड़कियां घर, समाज और दोस्तों के तानों से इस कदर परेशान हैं कि उन्होंने यह स्वीकार कर लिया है कि उन्हें कोई पसंद नहीं करेगा। काउंसलिंग के दौरान वह रोती हैं और कहती है कि वह इन सबसे परेशान हो चुकी हैं। उनके अंदर हीन भावना इतनी ज्यादा है कि उन्होेंने स्वीकार कर लिया है कि वह खराब ही हैं। काउंसलिंग में लड़कियों को समझाया जाता है कि वह अपने ऊपर विश्वास रखें कि वह जैसी हैं, खूबसूरत है। लोगों की बातों पर ध्यान न दें और अपनी काबलियत के दम पर अपनी पहचान बनाएं।
वैवाहिक विज्ञापनों में दिखती हैं समाज की सच्चाई
अप्सरा सी सुंदर, गोरी, लंबी, गृहकार्य में दक्ष, सर्वगुण संपन्न और घरेलू लड़की चाहिए। लड़कों के लिए छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों में लड़कियों से इन्हीं सारे गुणों की अपेक्षा की जाती है।
बाजार में मौजूद हैं यह प्रोडक्ट्स
बाजार में गोरा करने के दावा करने वाले स्किन वाइंटनिंग क्रीम, फेर वॉश, तेल, सीरम, बॉडी लोशन, साबुन, नाइट क्रीम और कैप्सूल मौजूद है। जबकि हकीकत यह है कि कोई भी ब्यूटी प्रोडक्ट आपको गोरा नहीं बना सकता है।
हमें बचपन से रूप-रंग की महत्ता पर सुनने को मिलता है। यही बातें आगे चलकर खूबसूरती को काबिलियत पर हावी कर देती हैं। वैसे बदलाव हो रहा है और लोगों की सोच में परिवर्तन आया है। - डॉ. राकेश पासवान, मनोचिकित्सक, कॉल्विन हास्पिटल