इलाहाबाद (ब्यूरो)। अंतरराष्ट्रीय गजल अकादमी और अंजुमन प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में हिंदुस्तानी एकेडेमी में आयोजित जश्न-ए-गजल के दूसरे रविवार को गजल के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इतिहासकार प्रो. लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि गजल एक ओर तहजीब की जुबान है तो दूसरी ओर जबान की तहजीब है। उन्होंने कहा कि यह बात ऐसे ही है जैस-एक अच्छा रचनाकार रचना को रचता है तो एक अच्छी रचना भी रचनाकार को रचती है।
डॉ. अमिताभ त्रिपाठी ने कहा कि गजलों में हिंदी की चेतना के साथ प्रगतिशील चेतना भी आई है। गजलों में प्रगतिशीलता का श्रेय हिंदी गजलकारों को है। फरमूद इलाहाबादी ने तंजोमिजाह की गजलों पर बोलते हुए कहा कि व्यंग्य करना मानव का स्वभाव है, इसलिए जब से संजीदा शायरी अस्तित्व में है तब से मजाहिया शायरी भी अस्तित्व में है। इसकी शुरूआत मिर्जा गालिब से हुई।
इसके पहले सत्र मेें एहतराम इस्लाम, धीरेंद्र शुक्ला, डॉ. असीम पीरजादा, डॉ. मो. आजम, डॉ. शहनवाज आलम, डॉ. विजय लोहार ने ‘हिंदी भाषा की गजल की अस्मिता के प्रश्न’ विषय पर अपनी बात कही। संचालन यश मालवीय, नंदल हितैषी ने किया। तीसरे सत्र में नशिस्त का आयोजन किया गया। इसमें मोहन बेगवाल, सागर आनंद, रश्मी कुलश्रेष्ठ, त्रिवेणी पाठक, मुनीष तन्हा, भारत भूषण जोशी, सरस दरबारी आदि ने गजल पाठ किया। संचालन डॉ. श्लेष गौतम ने किया।