प्रख्यात चिंतक एवं विचारक गोविंदाचार्य का कहना है त्रिपथगा कही जाने वाली गंगा दैहिक, दैविक एवं भौतिक तीनों तापों को दूर करती है। इसीलिए इसकी समस्या के समाधान के लिए तीनों तरीकों से परिहार भी होना चाहिए।
अध्ययन प्रवास के क्रम में बुधवार को डॉ.प्रमोद शर्मा के संयोजन में सर्किट हाउस में ‘गंगा भारत की जीवन रेखा’ विषयक फेसबुक लाइव में उन्होंने कहा, नवंबर 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा मिल गया। लेकिन, बीते 12 वर्षों में गंगा एक्ट नहीं बन पाया, जिसे अब तक बन जाना चाहिए था। खनन पर प्रतिबंध सहित सभी मौसम में सत्तर फीसदी जल का प्रवाह सुनिश्चित होना चाहिए।
शास्त्रों में लिखा है, नदी वेगेन शुद्धिता, उच्चतम बाढ़ बिंदु के दोनों तरफ 500 मीटर तक अतिक्रमण न हो। भौतिकवादी विकास से तात्कालिक लाभ भले ही दिखाई देता है लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से नुकसानदेह है। इस विकास से गैरबराबरी बढी़ और कमजोर वर्ग एवं महिलाओं की उपेक्षा हुई है।
गोविंदाचार्य ने कहा, तकरीबन 500 वर्षों में प्रकृति का विध्वंस हुआ। सघन पौधरोपण जरूरी है। गंगा जल में आर्सेनिक आदि हैवी मेटल्स का मिलना जनस्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अब समय आ गया है कि मानव केंद्रित विकास से प्रकृति केंद्रित विकास की ओर लौटें। जल, जंगल, जमीन के साथ जन का जीवन संतुलित हो। इहलोक और परलोक दोनों की सिद्धि हो। आज के दो सौ वर्ष पूर्व भी भारत की जीडीपी 26 प्रतिशत हुआ करती थी। गाय और गंगा की बदौलत भारत सोने की चिड़िया कहलाया। जिन्हें कोई ज्ञान नहीं है, वही ऐसा प्रश्न करते है कि गंगा चाहिए या विकास,यह मूर्खतापूर्ण प्रश्न है, गंगा भारत की जीवन रेखा है।