पूर्व केंद्रीय मंत्री रामपूजन पटेल का जाना हर उस इलाहाबादी को आहत कर गया जो उन्हें करीब से जानता, समझता या उनसे कभी मिला रहा। वह सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति थे कि हमारे बीच न होने के बावजूद यादों के गलियारे में हमेशा जीवित रहेंगे। उन्हें याद कर भावुक हुए सपा के राष्ट्रीय महासचिव रेवती रमण सिंह बोले, वह बहुत ही सहज तथा मृदुल स्वभाव के थे। गंगापार में उन जैसा जनाधार किसी और का नहीं रहा। उनके बाद गंगापार का कोई नेता लगातार तीन बार सांसद नहीं बना। अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी सदस्य प्रमोद तिवारी ने जोड़ा, खान-पान, आचार-व्यवहार और पहनावे से वह विशुद्ध इलाहाबादी थे। वह जितने सहज, उतने ही ईमानदार भी थे।
उत्तर प्रदेश केंद्रीय कर्मचारी महासंघ के कार्यकारी अध्यक्ष कृपाशंकर श्रीवास्तव बोले, तकरीबन एक सप्ताह पहले ही उन्हें देखने गया था, क्या पता था कि वह अंतिम मुलाकात होगी। केंद्रीय कर्मचारियों के कार्यक्रम में दिल्ली जाने पर कनॉट प्लेस पर घूमने के दौरान किसी ने पीछे से आकर कंधे पर हाथ रखा और कहा, यहां कैसे कृपाशंकर। यह रामपूजन पटेल थे। केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद वह संसद से निकलकर नार्थ ब्लाक स्थित आवास की ओर पैदल ही जा रहे थे। फिर साथ घर ले जाकर खुद बनाकर चाय पिलाई। एक बार एजी ऑफिस केसामने नीम के पेड़ के नीचे धरना दे रहे केंद्रीय कर्मचारियों के बीच आकर उन्होंने एक बोरी लाईचना लाकर रख दिया, यह कहते हुए कि यह मेरी ओर से सहयोग है। कर्मचारी हितों की बात करने वाले ऐसे नेता का जाना दुखद है।
इलाहाबाद विवि छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष श्याम कृष्ण पांडेय यादों में गुम हो गए। बोले, उनकी सादगी चकित करने वाली थी। कमलापति त्रिपाठी के मुख्यमंत्रित्वकाल में वह उपमंत्री हुए थे। लखनऊ से यहां के डीएम के पास यह सूचना आई कि उन्हें साथ लेकर लखनऊ आना है। पार्टी से जुड़े होने के कारण डीएम ने मुझसे संपर्क किया। जब मैंने उन्हें इस बावत बताया तो वह सहज ही मानने को तैयार नहीं हुए कि उन्हें मंत्री बनाया जा रहा है। उनकी कर्मपूजा ऐसी कि अपना कपड़ा खुद धोते और धोबी के पास देने के बजाय तकिये के नीचे रखकर प्रेस करते थे। विधायक रहने के दौरान भी वह कई बार लुंगी पहने हुए ही लोगों से मिलने जुलने आ जाते और उनकी मुश्किलें सुनते। किसी की भी परेशानी सुनने पर उसके समाधान में जुट जाते थे।
सीनियर सर्जन डॉ.नीरज त्रिपाठी ने निधन की खबर सुनी तो स्तब्ध रह गए। बोले, एमएस करते समय मेडिकल कॉलेज में वार्ड में राउंड के दौरान कई लोग धड़धड़ाते हुए घुसे और एक मरीज के पास आकर खड़े हो गए। मैंने भीड़ न लगाने और बाहर जाने का अनुरोध किया तो साथ आए लोग बोले, जानते नहीं सांसद जी हैं और हमसे बहस करने लगे। इस पर मैंने और डॉ.कार्तिकेय शर्मा ने उस कार्यकर्ता से कहा, तो फिर आपको और ध्यान रखना चाहिए और यह कहकर हम जाने लगे। इतने में आगे आकर उन्होंने कार्यकर्ताओं को शांत कराया और हमसे ‘सॉरी’ कहकर मरीज को देखने का आग्रह किया। किसी सांसद से अब ऐसी शालीनता की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
नहीं पी चाय, कोल्ड ड्रिंक, प्रिय थे कबीर के भजन
बेटे हाईकोर्ट में अधिवक्ता शांति प्रकाश पटेल बोले, बाबू जी सुबह चार बजे उठ जाते थे और पास के ही बॉटम पॉम के पत्तों की झाड़ू से घर की चौखट से लेकर सड़क किनारे तक खुद बुहारते थे। उन्होंने न कभी चाय पी न ही कोल्डड्रिंक, पान-गुटखा, तंबाकू को कभी हाथ नहीं लगाया। उनके सर्दी, जुकाम, खांसी, बुखार की बात भी हमें याद नहीं। उन्हें कबीर के तमाम भजन कंठस्थ थे, जिन्हें समय मिलने पर वह गुनगुनाते रहते थे। खाली समय में लेख, कविताएं भी लिखते थे। ‘अपनी भाषा, अपना देश, देता गौरव का संदेश’ का स्लोगन देने वाले बाबू जी हिंदी के अनन्य प्रेमी भी थे। संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य के तौर पर उन्होंने हिंदी माध्यम में परीक्षाओं की वकालत की थी।