माघ मेले में इस बार नई संस्थाओं को जमीन के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। जमीन कम होने के कारण ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर नई संस्थाओं को भूमि आवंटन किया गया। ऐसे में जमीन के लिए आवेदन करनी वाली सवा दो सौ नई संस्थाओं में महज 25 फीसदी को ही मेले में जमीन मिल सकी। बाकी संस्थाओं को अब अगले साल तक इंतजार करना पड़ेगा। हालांकि प्रशासन की ओर से प्रयास किया जा रहा है कि मेले में कुछ अतिरिक्त जमीन खोजी जा सके ताकि कुछ अन्य संस्थाओं को भी भूमि का आवंटन हो सके।
मेला क्षेत्र में पिछले साल 1550 बीघा जमीन मिली थी लेकिन इस बार कटान के कारण जमीन तकरीबन 100 बीघा कम हो गई। जमीन कम होने के बावजूद सभी पुरानी संस्थाओं को मेले में बसाए जाने का प्रशासन पर दबाव था। अफसरों ने पुरानी संस्थाओं को जैसे-तैसे जमीन आवंटित की। इसके अलावा तकरीबन सवा दो सौ नई संस्थाओं ने भी जमीन के लिए आवेदन किया था। जैसे-जैसे आवेदन आए, क्रमवार उन्हें कंप्यूटर में फीड कर दिया गया।
पुरानी संस्थाओं को जमीन आवंटन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रशासन ने नई संस्थाओं को तीन दिनों में क्रम के अनुसार ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर जमीन आवंटित की लेकिन सवा सौ में महज 65 नई संस्थाओं को ही जमीन मिल सकी। बाकी संस्थाओं का नंबर ही नहीं आया। दरअसल, पिछले साल आवंटन के बावजूद 40 पुरानी संस्थाओं ने शिविर नहीं लगाए गए थे। इस साल उनका आवंटन निरस्त कर नई संस्थाओं को भूमि दी गई है। प्रभारी अधिकारी माघ मेला आशीष कुमार मिश्र का कहना है कि गंगा में कटान के कारण मेला क्षेत्र में जमीन की कमी बनी हुई है। मेले में अतिरिक्त जमीन देखी गई है लेकिन उसे डेवलप करने में 15 से 20 दिन का समय लगेगा।