इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2009 से लंबित गैरजमानती वारंट पर कार्रवाई न होने पर आगरा के पुलिस कमिश्नर से व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने नाराजगी जताई है कि आखिर 17 साल तक गैरजमानती वारंट का पालन क्यों नहीं कराया जा सका। यह सवाल न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी ने आगरा के तत्कालीन जेलर कड़े सिंह की अग्रिम जमानत अर्जी पर किया।
2008 में पुलिस चार्जशीट पर संबंधित अदालत ने संज्ञान लेते हुए आरोपी को समन जारी किया था। इसके बाद आठ अप्रैल 2009 को पहली बार गैरजमानती वारंट जारी किया गया। बाद में 10 फरवरी 2012 को अदालत ने जमानत बॉन्ड जब्त करते हुए दोबारा कुर्की की कार्यवाही शुरू की। उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को पत्र भेजकर आरोपी की गिरफ्तारी सुनिश्चित कराने का अनुरोध किया।
याची की ओर से दलील दी गई कि उसे इन आदेशों की जानकारी नहीं थी। नवंबर 2025 में जब वह ट्रेजरी में जीवन प्रमाणपत्र जमा करने गया। तब एक सहकर्मी से उसे मामले की जानकारी मिली। इसके बाद उसने संबंधित अदालत में अग्रिम जमानत अर्जी दाखिल की। लेकिन, 15 दिसंबर 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दी गई कि उसके खिलाफ गैरजमानती वारंट और कुर्की की कार्यवाही पहले से लंबित है।
कोर्ट ने कहा कि याची सरकारी कर्मचारी था। उसके निवास व कार्यस्थल की जानकारी विभागीय अधिकारियों को थी। फिर भी 2009 से अब तक वारंट का तामील नहीं हो सका। कोर्ट ने इस पर विस्तृत जांच कर आगरा के पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। ब्यूरो