इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत आरोपी ट्रायल के अंतिम निस्तारण के बाद भी नाबालिग होने का दावा पेश कर सकता है। इसके लिए उसे किशोर न्याय बोर्ड या संबंधित ट्रायल कोर्ट की शरण लेना होगा, वहां उसकी उम्र निर्धारण की जांच हो सकती है।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी की एकल पीठ ने जालौन निवासी नाबालिग समेत दो आरोपियों की याचिका खारिज कर दी। आरोपियों ने दहेज उत्पीड़न व पीड़िता को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में बतौर आरोपी तलब किए जाने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
मंजूलता की शादी 11 मई 2003 को प्रहलाद शरण के साथ हुई थी। मौत के बाद दर्ज एफआईआर में आरोप लगा कि सुसराल के लोगों ने अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर उन्हें परेशान किया था। इससे तंग आकर उन्होंने आत्महत्या कर ली।
मामले के ट्रायल के दौरान कोर्ट ने 20 मार्च 2017 पति व देवर को बतौर आरोपी ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ इन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि महिला का देवर घटना के समय नाबालिग था। उसकी उम्र 14 वर्ष थी। लिहाजा, उसे किशोर मानते हुए ट्रायल के लिए जारी तलबी आदेश को रद्द किया जाना चाहिए। कोर्ट ने दलील सिरे से खारिज कर दी। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने प्रथम दृष्टया साक्ष्यों के आधार पर समन आदेश पारित किया था।
उस समय आरोपी की उम्र संबंधी कोई दावा ट्रायल कोर्ट के समक्ष नहीं रखा गया था। लिहाजा, ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी को अपनी उम्र के निर्धारण और खुद को नाबालिग घोषित करने के लिए किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष अर्जी दाखिल करने की छूट दी है।